
Author: Rail Duniya
अपना रेल टूर आसान कीजिए, सर्क्युलर जर्नी टिकट लेकर।
राजिन्दर को अलग अलग जगह घूमने जाने का बहोत शौक था। बच्चों की एक्ज़ाम होते ही, कोई न कोई प्लान बन जाता था। टिकट बनाना, होटल की बुकिंग करना सब आजकल इंटरनेट पर हो जाता है। इस बार उसकी इच्छा थी, किसी एक जगह न जाते हुए, 8 -10 जगह का लंबा टूर बनाना, और इसी लिए वो रेलवे के जानकार, सुखीरामजी के पास आया था।
“सुखी पाजी, क्या वो पहले ब्रेक जर्नी करते करते यात्रा करने वाली रेलवे की टिकट अब भी बनती है?”
हाँ काके, उसे सरकुलर जर्नी टिकट कहते है, बीचमे GST की वजह से बन्द कर दी गई थी, जो 1 सितंबर 2018 से फिर से, सभी क्लास के लिए शुरू हो गई है। लेकिन अब सभी श्रेणी के टिकटोंको पूरे किराए पर 5% GST लगेगी।
“पाजी, मुझे यह CJT याने सर्क्युलर जर्नी टिकट का फण्डा पूरा समझाइये न।”
देखो, पहले इस CJT के फायदे बताता हूँ, जिस किसीको अलग अलग स्टेशनोंपर यात्रा करनी है, उसके लिए तो CJT बेस्ट ऑप्शन है। एकही बार मे पूरा स्टार्ट टू एन्ड याने आने जाने का पूरा टिकट बना लो। हर पॉइंट से पॉइंट का टिकट लेने का झंझटों से मुक्ति पाओ। इसका किराया निकलने का तरीका इस तरह होता है, पूरी टोटल यात्रा का दो हिस्सा करके, एक हिस्से को जो किराया होगा उसके डबल किराया चार्ज होता है। उदाहरण के तौर पे, आपकी कुल यात्रा 5000km की है तो 2500km जाने की यात्रा और 2500km आने की यात्रा, ऐसा किराया चार्ज होगा। याने किराए में टेलिस्कोपिक रेट का फायदा भी मिल जाता है। रेलवे में जितना लम्बी दूरी का टिकट उतना पर किलोमीटर रेट कम होते जाता है, उसे टेलिस्कोपिक रेट कहते है।
यह टिकट कमसे कम 1,500 km से लेकर ज्यादा से ज्यादा 10,000 km तक का बनता है। टोटल यात्रा में ज्यादा से ज्यादा 8 ब्रेक जर्नी याने रुकने के स्टेशन मिल पाएंगे। गाड़ी बदलने के लिए यदि किसी जंक्शन स्टेशनपर रुकना पड़ा, जो 24 घंटे से कम समय हो तो उसे ब्रेक जर्नी नही माना जाएगा।
यह CJT में स्टार्टिंग स्टेशन और एन्ड स्टेशन एकही रहना जरूरी है।
टिकट बनाने के किए DCM विभागिय वाणिज्य अधिकारी या स्टेशन मैनेजर से सम्पर्क करना होगा, अपना यात्रा का सम्पूर्ण कार्यक्रम लिखित रूप में उनके पास सबमिट करने के बाद वे आपको एक फॉरमेट में टिकट डिटेल्स अप्रूव्ह कर के देंगे जिसे लेकर आपको रिजर्वेशन ऑफिस में जाकर टिकट बनवाना होगा।
टिकट की यात्रा अवधी तय करने के लिए, आपके टिकट के कुल अंतर को 125 km/day से 135km/day से गिना जाएगा, याने 5000km की टिकट के लिए कुल 38 से 40 दिन की यात्रा अवधि मिलेगी। याने इतनी अवधि में आपको अपनी यात्रा पूरी करनी है। जो भी ब्रेक आप यात्रा के दौरान लोगे उसमे दिनोंके बन्धन नहीं रहेंगे, याने कोई स्टेशनपर आप 4 दिन, कोई स्टेशनपर 2 दिन अपने प्रोग्राम के हिसाबसे रुक सकते हो।
इसमें एक विशेषता और है, यदि आपका टिकट 1000km से ज्यादा अंतर का है और आपके साथ वरिष्ठ नागरिक है तो उन्हें वरिष्ठ नागरिकों को मिलनेवाली रियायत भी मिलेगी।
क्यों राजिंदर पापे, है की नहीं बल्ले बल्ले। तो आगेसे कोई टूर, तीर्थयात्रा करना है तो CJT ले लेना।
वाह री सुपरफास्ट !
भारतीय रेल में कई तरह की यात्री गाड़ियाँ चलाई जाती है। जिसमे शुरुसे तीन प्रकार थे मेल, एक्सप्रेस और सवारी गाड़ियाँ।
वैसे तो तेज गाड़ियोंका चलन राजधानी एक्सप्रेससे, 1969 से शुरू हुवा। सबसे पहली राजधानी एक्सप्रेस हावड़ा नई दिल्ली के बीच 3 मार्च 1969 को चलाई गई। राजधानी एक्सप्रेस चलाने की मुख्य संहिता किसी राज्य की राजधानी से देश की राजधानी तक, कमसे कम समय मे पहुंचना यह थी। लेकिन सुपरफास्ट का टैग लेकर चलने वाली सबसे पहली गाड़ी थी मुंबई हावड़ा गीतांजलि एक्सप्रेस जो नवम्बर 1977 में शुरू की गई। सुपरफास्ट होने का मानक था, गाड़ी की अपनी पूर्ण यात्रा का एवरेज स्पीड, गति 55 km प्रति घंटा या उससे ज्यादा का रहना चाहिए।
1988 में भोपाल नई दिल्ली शताब्दी शुरू की गई, जिसने राजधानी एक्सप्रेस का देश की सबसे तेज गाड़ी होने का रिकार्ड तोड़ा। अभी तेज गाड़ियोंकी श्रेणी में कई नाम जुड़ गए है। देश की सबसे तेज गाड़ीयों में सबसे पहले आती है, वन्दे भारत एक्सप्रेस, उसके बाद गतिमान एक्सप्रेस, और फिर आती है, दुरंतो एक्सप्रेस। इन के बाद सुपरफास्ट में ही लेकिन अलग श्रेणी की एक्सप्रेस गाड़ियाँ है, जनशताब्दी, संपर्क क्रांति, अंत्योदय, गरीब रथ एक्सप्रेस। लेकिन हमारा आज का विषय है सुपरफास्ट टैग वाली, हर छोटे बड़े स्टेशनोंपर ठहरने वाली गाड़ियाँ।
एक मानक, सिर्फ वही एक, एवरेज स्पीड 55 km प्रति घंटा लगाने से कई साधारण गाड़ियाँ सुपरफास्ट एक्सप्रेस की श्रेणी में आ गई है। 1977 से याने आजसे 42 साल पहले जो मानक सुपरफास्ट श्रेणी के लिए तय किया गया था, आज के गतिमान और वन्दे भारत एक्सप्रेस के जमाने मे भी वही चला आ रहा है। आज की जो तथाकथित सुपरफास्ट गाड़ियाँ है वो किसी मायने में सुपरफास्ट नही लगती, भलेही उनका एवरेज स्पीड 55 km/h हो। हर 25 km पर स्टॉप लेने वाली 12139/12140 सेवाग्राम एक्सप्रेस को कोई सुपरफास्ट कैसे कह सकता है? यह तो एक उदाहरण है, ऐसी कई गाड़ियाँ है, जिनमे सुपरफास्ट गाड़ी होने के कोई लक्षण नज़र नही आते, गिनवाए तो कई पेजेस कम पड़ जाएंगे।
आखिर क्या मिथक है, ऐसी गाड़ियोंको सुपरफास्ट टैग लगाने का? क्या रेल प्रशासन, आम लोगोंसे सुपरफास्ट चार्ज, जो द्वितीय श्रेणी के ₹15/- से लेकर फर्स्ट एसी के ₹75/- तक वसूल कर के अपना घाटा, पाट रही है?
कोई गाड़ी अपने यात्रा में कमसे कम 100 km तक ना रुके तो समझता है, यहां हर 25 km पर रुकने वाली सुपरफास्ट? जब छोटी, कम अंतर वाली यात्रा करने या के रोजाना जाना आना करने वाले यात्रिओंको यह सुपरफास्ट का अतिरिक्त प्रभार चुकाना याने सचमुच अतिरिक्त भार ही लगता है।
आज रेल प्रशासन को जरूरी है, की वे अपने सुपरफास्ट के नए मानक तयार करें। जो लम्बी दूरी तक चलने वाली, कम स्टोपेजेस लेनेवाली गाड़ियोंको ही सुपरफ़ास्ट का दर्जा दे। सुपरफास्ट गाड़ियोंकी एवरेज गति में भी सुधार होने की जरूरत है। नहीं तो ट्रेक की, लोको की, नए LHB डिब्बोकी क्षमता 160km/h और गाड़ी की एवरेज स्पीड देखों तो आती है 55 km/h आज की सवारी गाड़ियाँ भी 110 km/h की दौड़ लगा लेती है।
रेल प्रशासन, भले ही एवरेज इन्कम में बढ़ोतरी का उद्देश्य रखती हो या लूज और मार्जिन टाइमिंग्स देकर गाड़ियोंके समय पालन की शाबासी लेना चाहती हो, लेकिन आज 42 वर्षोंके बाद, कहीं न कहीं, सही मायने में सुपरफास्ट गाड़ियोंकी व्याख्या तय करने का वक्त आ गया है।
डायल 182
सरकारी मशीनरी मुस्तैदी दिखाए और अपना फ़र्ज निभाए तो क्या कुछ नही हो सकता, इसका अत्युत्तम उदाहरण ओडिशा में दिखाई दिया है। सरकारी मशीनरी की उपयुक्तता फ़ांनी चक्रवात पर भारी पड़ी, जिस तरह चक्रवात ने तबाही और उत्पात मचाया उसके मुकाबले कई जाने बचा ली गई।
इसी तरह रेलवे के पास भी अत्याधुनिक तकनीक और इसके संचालन के लिए लगने वाला बेहतरीन स्टाफ़ उपलब्ध है। आज हम आपको रेलवे की सुरक्षा को चाकचौबंद रखने वाले रेलवे सुरक्षा बल से मिलवाते है।
भारतीय रेल कितनी विशाल है और इसकी सम्पत्ती कितनी बड़ी मात्रा में है, यह जानने के लिए पहले हमें कुछ आंकड़े देखने पड़ेंगे।
दुनिया का सबसे बडा ऐसा चौथे नम्बर का रेल नेटवर्क है भारतिय रेल । जो रोजाना उपनगरीय और लम्बी दूरी की करीबन 20,000 यात्री गाड़ियाँ चलाता है, और 9,200 से ज्यादा मालगाड़ियां अलगसे चलती है।छोटे बड़े कुल 7,300 से भी ज्यादा रेलवे स्टेशन है। 2,78,000 मालगाडीके डिब्बे, 71,000 यात्री डिब्बे और 11500 लोको इंजिन रेलवे के पास है। करीबन 13 लाख से भी ज्यादा कर्मचारी आज रेलवे में काम कर रहे है।
इस विशालतम, महाकाय रेलवे की, उसकी सम्पत्ती की सुरक्षा हेतु रेलवे के पास अपनी खुद की सशस्त्र पुलिस दल है, उसका नाम है रेलवे सुरक्षा बल RPF।
वैसे तो RPF की शुरवात रेलवे के भारत आने के साथ ही हो गई थी, लेकिन तब रेलवे अलग अलग कम्पनियों में बटी थी और इसे कहते थे कम्पनी पुलिस या प्राइवेट पुलिस। RPF की यथोचित स्थापना RPF ऐक्ट के तहत 1957 की गई और RPF ऐक्ट का नियम संशोधन 1987 में किया गया।
रेलवे सुरक्षा बल का जिम्मा है, रेलवे की सम्पत्ती की रक्षा करना, रेलवे के यात्रिओंको सुरक्षा प्रदान करना उनके जान माल की रक्षा करना। रेलवे के दायरे में जो भी असामाजिक तत्वोंको निपटना, रेलवे कर्मचारियों को अपनी ड्यूटी करने में बाधा लाने वालोंको नियंत्रित करना और महिला यात्री, बच्चों को मानवी तस्करी से बचाना।
रेलवे सुरक्षा बल का एक महत्वपूर्ण काम और भी है। रेलवे में दो तरह की पुलिस काम करती है, RPF और GRP याने सरकारी रेलवे पुलिस। रेलवे से दायरे के बाहर के सिविल कार्य है याने चोरी, डकैती, दुर्घटना की रपट और तहकीकात करने का काम GRP करती है। GRP और रेलवे प्रशासन को एक पुल की तरह जोड़ने का काम यह RPF करती है।
आज रेलवे सुरक्षा बल में उनके अधिकारियों सहित, 1,75,000 जवान का स्टाफ़ कार्यरत है। चलती गाड़ियोंमे, रेलवे के प्लेटफार्म पर, रेलवे स्टेशन की सभी जगह पर मुस्तैदी से, अपने शस्त्र लेकर, यात्रिओंको सुरक्षित होने का एहसास दिलाते है। रेल यात्री, अपने रेल सफर में, अपने फोन से 182 डायल करके कभी भी इनसे अपनी सुरक्षा के लिए मदत मांग सकता है।
रेल सुरक्षा बल, रेल यात्री की सुरक्षा हेतु 24 घंटे और 365 दिन कटिबद्ध है।
