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‘रियायत’ की कृपा नहीं, सुविधाओं का सहारा काफी है।

02 अप्रैल 2024, मंगलवार, चैत्र, कृष्ण पक्ष, अष्टमी, विक्रम संवत 2080

आजकल चुनावी दौर में विधानोंको एक अलग दृष्टिकोण से जनमानस के सामने लाया जाता है। इससे आम जनता के मन किंतु निर्माण होता है। धीरे धीरे एक छोटे से किन्तु को सहलाकर, सुलझाकर उसका बड़ा मुद्दा बनाया जाता है। खैर, हम हमारे रेल वाले विषय की ओर रूख़ करते है। विषय है, रेल सेवा में वरिष्ठ नागरिकोंको यात्री किरायोंमे दी जाने वाली रियायत।

यूँ तो 01 मई 1989 से पहले रेल किरायोंमें वरिष्ठ नागरिकोंको किसी भी रेल किराए में कोई रियायत नही मिलती थी। इसे 01 मई 1989 से, मेल/एक्सप्रेस के द्वितीय श्रेणी मूल किरायोंका आधार बनाकर, उन किरायोंमे 25% छूट का प्रावधान किया गया। यह छूट अपनी उम्र के 65 या 65 वर्ष से आगे के सभी पुरुषों, स्त्रियों के लिए लागू थी। आरक्षण शुल्क वगैरा अलग लागू रहेंगे। हाँ, एक और शर्त थी, यात्रा 500 किलोमीटर से ज्यादा होना आवश्यक थी। रियायत केवल द्वितीय श्रेणी, ग़ैरवातानुकूलित वर्ग और मेल/एक्सप्रेस में ही उपलब्ध थी।

वर्ष बितते गए और राजनीतिक कारणोंसे, इन रियायतोंका विस्तार किया जाने लगा और शर्ते हटती चली गई। वर्ष 1999 में यह रियायत भारतीय रेल के सभी वर्गों और राजधानी, शताब्दी सहित सारी गाड़ियोंमे उपलब्ध करा दी गई। वर्ष 2001 में वरिष्ठ नागरिक किराया रियायत के लिए पुरुष की उम्र 65 या उससे ज्यादा और महिला की उम्र 60 या उससे ज्यादा तय की गई और साथ ही छूट का प्रावधान 25% से बढ़कर 30% हो गया।

मित्रों, आगे राजनीति में गठबन्धन के सरकारोंके राज आए और छूट और व्यापक की गई। वरिष्ठ नागरिकोंको अब रेलवे के सभी वर्ग और गाड़ियोंमे 50% की छूट और महिलाओं की उम्र 60 की जगह 58 कर दी गई।

यह सारी रियायतोंकी व्यवस्था संक्रमण आने तक जारी थी। संक्रमण काल मे सारी यात्री गाड़ियाँ बन्द की गई और उसके साथ ही यह वरिष्ठ नागरिकोंकी रियायत भी बन्द कर दी गयी। तब यह तर्क दिया गया था, वरिष्ठ नागरिकोंको किराया रियायत देकर यात्रा करने के लिए उत्तेजित नही करना है। गाड़ियाँ तो शुरू हो गई मगर वरिष्ठ नागरिक रियायत शुरू नही की गई। मगर एक प्रावधान यथावत जारी रहा, वरिष्ठ नागरिकोंके लिए निचली बर्थ गाडीके तत्काल आरक्षण खुलने तक उपलब्ध रखी गई। अर्थात यह योजना पहले आओ, पहले पाओ तत्व पर थी और जब तक बुक नही हो जाती तब तक उपलब्ध रहती थी।

आज की अवस्था मे, सोशल मीडिया में जब ‘भारतीय रेल ने वरिष्ठ नागरिक रियायत बन्द कर पाँच हजार करोड़ कमाए’ ऐसी खबरें वायरल की जाती है, तब आश्चर्य होता है। एक तरफ रेल विभाग यात्रिओंको शून्य मूल्य पर कई सुविधाओं को मुहैया कराता है। प्लेटफार्म पर पहुंचने के लिए रैम्प, लिफ्ट, एस्केलेटर, बैठने के लिए व्यवस्था, वेदर शेड्स, पंखे, पीने के लिए शीतल जल इसके अलावा पानी के नल, शौचालय इत्यादि व्यवस्था की जाती है। बड़े स्टेशनोंपर इन्ही व्यवस्थाओंका प्रीमियम वर्जन अधिमूल्य पर उपलब्ध कराया जाता है। यही सारी व्यवस्था राज्य परिवहन निगम के बस अड्डों पर ना ही दिखाई देती है और न ही कोई उसके लिए आग्रह करता दिखता है।

सोशल मीडिया का छोड़िए, वहाँ बहुतेरे इंफ्लुएंसर्स रहते है और उनका काम ही है, विविध विषयोंको लेकर आम जनता को उत्तेजित करना। मगर आम जनता इन किराया रियायतोंके बारे में क्या सोचती है? मित्रों, यकीन मानिए, बहुत से वरिष्ठ नागरिक यह सोचते है, उन्हें व्यर्थ कृपा दृष्टि की आस नही है। यदि, रेल प्रशासन सोचती है, उन्होंने सभी टिकट धारकोंको ऐसे ही 56% मूल्य में टिकट देते रहना है ( ध्यान दें : रेलवे के टिकटों पर छपा वाक्य 😊) तो और अतिरिक्त रियायत की क्या आवश्यकता है? मगर वरिष्ठ नागरिकोंकी सुविधा, जैसे की ‘लोअर बर्थ कोटा’ बदस्तूर जारी रहना चाहिए। प्रत्येक बड़े  स्टेशनपर लिफ्ट, एस्केलेटर, यथोचित मूल्य पर  बैटरी कार आवश्यक रूप में उपलब्ध रखी जाए। रेलवे प्लेटफार्म पर जो भी व्यवस्था अर्थात वेदर शेड्स, पानी के नल, शौचालय, बैठक व्यवस्था, कोच इंडिकेटर, आवश्यक सहायता अद्यतन प्रकार से उपलब्ध रहें।

जाहिर सी बात है, देश की आबादी की औसत उम्र अब बढ़ती ही जा रही है और साथ ही साथ इस उम्र के यात्रिओंकी संख्या भी बढ़ती रहेगी। ऐसी स्थिति में वरिष्ठ नागरिक की यह अपेक्षा है, उन्हें रियायत की कृपा नही अपितु सुविधाओं का सहकार्य मिलना चाहिए।

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सिकन्दराबाद – हिसार के बीच चलनेवाली 22737/38 द्विसाप्ताहिक सुपरफास्ट के भी दिन बहुरेंगे।

01 अप्रैल 2024, सोमवार, चैत्र, कृष्ण पक्ष, सप्तमी, विक्रम संवत 2080

22737/38 सिकन्दराबाद हिसार के बीच चलनेवाली द्विसाप्ताहिक सुपरफास्ट अप्रैल 2024 के दूसरे सप्ताह से अपना कलेवर बदल रही है। अब तक यह गाड़ी पुराने ICF उत्कृष्ट कोच संरचना के साथ चलाई जा रही थी, जिसे LHB के नए कोच संरचना से सुसज्जित किया जाएगा।

बदली हुई कोच संरचना में अब वातानुकूल प्रथम श्रेणी नही रहेंगी। नई कोच संरचना में 03 वातानुकूल टू टियर, 06 वातानुकूल थ्री टियर, 01 वातानुकूल बफेट/पेंट्रीकार, 08 स्लिपर, 02 द्वितीय श्रेणी साधारण, 01 एसएलआर, 01 जनरेटर वैन कुल 22 कोच लगाए जाएंगे।

22737 सिकन्दराबाद हिसार सुपरफास्ट दिनांक 09 अप्रैल 2024 से और 22738 हिसार सिकन्दराबाद सुपरफास्ट दिनांक 12 अप्रैल 2024 से LHB संरचना के साथ चलना शुरू कर देगी।

यात्रीगण को इस गाड़ी के LHB करण का बहुत दिनोंसे इंतजार था।

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देर आए, दुरुस्त आए!

गाड़ी कोच संरचना के मानकीकरण में किया जा रहा है यात्री आवश्यकता नुसार बदलाव

30 मार्च 2024, शुक्रवार, चैत्र, कृष्ण पक्ष, पंचमी, विक्रम संवत 2080

भारतीय रेल में यात्री गाड़ियोंकी कोच संरचना का मानकीकरण किया जाना, रेल के ग़ैरवातानुकूलित कोचों के यात्रिओंके आसन व्यवस्था की कटौती में बदल गया। किसी लम्बी दूरी की मेल/एक्सप्रेस में द्वितीय श्रेणी साधारण के यात्री कोच वैसे भी कम ही होते थे और यह लोग ग़ैरवातानुकूलित शयनयान स्लिपर में अपना तालमेल बिठा कर यात्रा कर लेते थे। कोच संरचना मानकीकरण में सारे ग़ैरवातानुकूलित कोच की भारी कटौती की गई और यह यात्रिओंका रुख वातानुकूलित कोचों में सीधी घुसपैठ की ओर बढ़ गया। आए दिन शिकायतें बढ़ने लगी और कोच संरचना का मानकीकरण विषय, बड़ा वादग्रस्त विषय बन गया।

रेल प्रशासन की, इस कोच मानकीकरण के जरिए जो मेल/एक्सप्रेस गाड़ियाँ अपने गंतव्य स्टेशन पर पहुँच कर खाली समय व्यतीत करती थी, उसका उपयोग कुछ देरी से पहुँचने वाली अन्य गाड़ियोंके वापसी फेरे के लिए उपयोग करने की सोच थी। मानकीकरण किए जाने से उन गाड़ियोंकी कोच संरचना एकसमान रहती थी और उससे यात्रिओंकी अग्रिम आरक्षण को कोई बाधा नही पहुंचती थी। साथ ही साथ देरी से पहुँची गाड़ी की वापसी फेरे में समयपर छोड़ी जा सकती थी। संकल्पना बहुत ही सटीक और व्यवस्थित थी मगर किसी मुख्यालय से निकले परिपत्रक की व्याख्या कोई क्षेत्रीय कार्यालय किस तरह करेगा इसका कोई भरोसा नही। आइए, पहले वह वर्ष 2022 का रेल मुख्यालय का परिपत्रक देखते है,

रेल प्रशासन ने कोच संरचना मानकीकरण के प्रपत्र में उनकी योजना जाहिर कर दी, मगर आगे उक्त विषय मे क्षेत्रीय रेल के संज्ञान को भी महत्व दिया गया है। क्षेत्रीय रेल अपनी आवश्यकताओं के अनुसार रेल प्रशासन से अग्रिम अनुमति ले कर कोच संरचना के मानकीकरण से परे जाकर, बदलाव करा सकती है। अर्थात किसी क्षेत्रीय रेल को यह एहसास है, अभ्यास है, की उनकी फलाँ गाड़ी में वातानुकूलित कोचों की जगह ग़ैरवातानुकूलित कोच, द्वितीय श्रेणी साधारण या स्लिपर कोच की संख्या ज्यादा हो, तो वह उस प्रकार की संरचना रेल प्रशासन से अनुमति प्राप्त कर, बना सकती है।

अब यह बात और हे, की कई क्षेत्रीय रेल ने इस बात को महत्व नही दिया और जिस तरह रेल मुख्यालय से कोच संरचना के मानक भेजे थे, उसी प्रकार अपनी गाड़ियोंमे कोच संरचना करवा ली। जब साधारण टिकटधारियों का हुजूम वातानुकूल यात्रिओंकी व्यवस्था में हाहाकार मचाने लगा और आए दिन शिकायतोंके अम्बार रेल मुख्यालय, मंत्रालय तक दस्तक देने लगे तब जाकर मुख्यालय ने इस बारेमे संज्ञान लिया और क्षेत्रीय रेलवे को कोच संरचना सुधारने के निर्देश दिए। इसका परिणाम यह हुवा की कई लम्बी दूरी की मेल/एक्सप्रेस गाड़ियोंमे वातानुकूल कोच कम होने जा रहे है और उसके ऐवज में ग़ैरवातानुकूलित कोच, स्लिपर और द्वितीय श्रेणी साधारण कोच बढ़ाए जा रहे है। उदाहरण के लिए 12779/80 वास्को हज़रत निजामुद्दीन वास्को गोवा सुपरफास्ट का यह कोच संरचना बदलाव देख लीजिए,

गोवा एक्सप्रेस में स्लिपर, साधारण कोच 02- 02 की जगह 06 और 04 किए जा रहे है। अर्थात वातानुकूल कोच टू टियर 02 की जगह 01, वातानुकूल थ्री टियर इकोनॉमी 04 की जगह 02 और वातानुकूल थ्री टियर 04 की जगह 01 रह जाएंगे। गाड़ी में कुल 20 कोच यथावत बने रहेंगे।

आखिरकार भारतीय रेल को आम रेल यात्री की सुध लेनी पड़ी। भले देर से आए मगर दुरुस्त आ ही गए! 😊

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यात्रीगण सावधान! आप विशेष गाड़ी में यात्रा कर रहे है।

29 मार्च 2024, शुक्रवार, चैत्र, कृष्ण पक्ष, चतुर्थी, विक्रम संवत 2080

चौक गए! चौंकिए मत, सावधान हो जाइए। यदि आप विशेष गाड़ी में यात्रा करने जा रहे है तो आपको कुछ बातें समझ लेना बेहद जरूरी है। रेल विभाग यह बातें आपको कभी नही बताएगा।

सर्वप्रथम यदि आप विशेष गाड़ी की समयसारणी देख अपनी यात्रा का नियोजन कर रहे है, तो भूल जाइएगा की यह गाड़ी समयपर आपको आपके गन्तव्य स्टेशनपर पहुंचाने वाली है। भैय्या, जब प्रारम्भिक स्टेशन से समयपर चली हो तब ही तो न आगे समय पर चली 😊 आप रेल विभाग के ऍप, वेबसाइट पर किसी भी विशेष गाड़ी का परिचालन देख लीजिए, ऐसे चलती है, जैसे समयसारणी इनके लिए बनी ही नही है, 2-4 घण्टे देरी से चलना इनके लिए सामान्य बात है।

इन गाड़ियों के शेड्यूल में स्टोपेजेस बहुत कम होते है, यह बात और है की अनशेड्यूल्ड स्टोपेजेस पर यह गाड़ियाँ घण्टों बिता देती है, जहाँ चाय, नाश्ते की क्या पानी तक की अपेक्षा आप नही रख सकते। गाड़ी में पेंट्रीकार नही होती इसका अर्थ यह है की आपका खानपान केवल अवैध विक्रेता के रहमोंकरम पर निर्भर है। यह दाता लोग आपको जो लाकर खिला देई, जम जावे तो जो दाम मांगे देकर खा लीजिएगा। हाँ, एक विशेष गौर करने लायक बात है, गाड़ी का रखरखाव स्टाफ़ आपको पानी बोतलें ₹20/- में बेचता हुवा मिल जाएगा। तात्पर्य यह है, इस गाड़ी के यात्री अपना दाना-पानी का जुगाड़ साथ ले कर चले अन्यथा अपनी यात्रा का पारणा गन्तव्य स्टेशनपर ही हो पाएगा।

रेल विभाग इन विशेष गाड़ियोंमे यात्रिओंको अतिरिक्त किराया दर से टिकट बेचता है, उनका मन करता है, तो सुपरफास्ट की संज्ञा भी इन गाड़ियोंमे जोड़ देते है, और किरायों में इज़ाफ़ा! ओर प्रताड़ना ऐसी की, सुपरफास्ट और अतिरिक्त किराया लेने के बावजूद गाड़ी 5-6 घण्टे देरी से चलाते है।

आप उदाहरण के तौर पर 01045/46 लोकमान्य तिलक टर्मिनस – प्रयागराज जंक्शन के बीच चलनेवाली विशेष गाड़ी को लीजिए। 01045 सुपरफास्ट (?) विशेष लोकमान्य तिलक टर्मिनस से 12:15 को प्रत्येक मंगलवार को निकलती है और बुधवार को सुबह 11 बजे प्रयागराज को पहुंचती है और वापसी में 01046 विशेष उसी दिन, बुधवार को शाम 18:50 पर प्रयागराज से अपनी वापसी दौड़ शुरू करती है। तो जनाब यह गाड़ी इसके इतिहास में कभी 11:00 बजे प्रयागराज में नही पहुंची। 01045 विशेष को प्रयागराज में उसी प्लेटफॉर्म क्रमांक 2 पर लिया जाता है, जहाँ से उसे 01046 बन कर वापसी यात्रा शुरू करनी होती है और वह भी उसी समयपर जैसे अमूमन गाड़ियाँ अपने प्रारम्भिक स्टेशनपर चलने के लिए लगती है। अर्थात 01045 मुंबई से प्रयागराज गाड़ी शाम 17 से 18 बजे के अंदाज में प्रयागराज पहुँचेंगी और 01046 बिल्कुल समयपर अपनी वापसी यात्रा शुरू कर देगी। अब आगे विडम्बना देखिए, 01046 शाम 18:50 को प्रयागराज से चल कर अगले दिन 16:05 को लोकमान्य तिलक टर्मिनस पहुँचने वाली है। मगर लोकमान्य तिलक टर्मिनस पर इस के रैक की जरूरत रात 22:15 को थिविम के लिए रवाना होने वाली 01187 विशेष के लिए है तो रेल प्रशासन उसे ठीक उसी समय के अंदाज में लोकमान्य तिलक टर्मिनस पर ले जाता है, अर्थात 5-6 घण्टे देरीसे अमूमन रात 22 बजे।

रेल विभाग के सुत्रोंसे पता चलता है, सारी विशेष गाड़ियाँ उनके लिए अनशेड्यूल्ड अर्थात उनके समयपालन पत्रक के हिसाब में अतिरिक्त गाड़ियाँ है, जिन्हें शून्य प्रायोरिटी, शून्य प्राथमिकता पर चलाया जाता है

ऐसी स्थिति में हम रेल विभाग से आग्रह करते है, विशेष गाड़ियोंके समयसारणी का संशोधन कीजिए और जो आपके समयपालन में सेट होता हो वहीं यात्रिओंके सामने रखिए। यात्रिओंसे अतिरिक्त तत्काल किराए, सुपरफास्ट अधिभार लगाकर उन्हें धोखा मत दीजिए। मा. उच्च न्यायालय ने हाल ही में ट्रेन प्रायोरिटी पर संज्ञान लेकर रेल विभाग को खूब सुनाया है, जब मालगाड़ियाँ चल सकती है, तो यात्री गाड़ियाँ क्यों नही चल सकती।

रेल विभाग अपनी सहूलियत के हिसाब उन्हें टर्मिनल स्टेशन पर पहुंचाती है तो उस के मुताबिक समयसारणी क्यों नही बनाती? यात्री जब टिकट बुक करता है तो उसे रेल विभाग की दी गई समयसारणी पर विश्वास होता है और रेल विभाग उस विश्वास को पूरा रसातल में डुबो देता है। विशेष गाड़ियोंकी समयसारणी ऐसी हो की यात्री को पता हो, गाड़ी गंतव्य स्टेशन पर कब पहुंचने वाली है, टिकट बनाते वक्त कमसे कम यात्री तो किसी धोखे में नही रहेगा।

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अनियमितताओंसे निजात पाने के लिए क्या कर सकता है, रेल प्रशासन!

23 मार्च 2024, रविवार, फाल्गुन, शुक्ल पक्ष, चतुर्दशी, विक्रम संवत 2080

यूँ तो भारतीय रेल और उसके रेलवे स्टेशनोंने अपना रंगरूप, कलेवर काफी हद तक बदल लिया है मगर यात्री है की अभी तक पुराने ढर्रे पर ही अटके हुए है। रेल प्रशासन ने स्टेशनोंपर खानपान विभाग में हर जगह नियमावली लिख रखी है, छपे मूल्य से ज्यादा दाम न दें। सामान, सामग्री के भुगतान हेतु बिल की माँग करें। यह बात और है, की ना ही विक्रेता के पास बिलिंग मशीन्स है और न ही यात्री को बिल की दरकार रहती है। 😊

सबसे बड़ा घोटाला पानी बोतलोंका है। रेल प्रशासन की इकाई, आईआरसीटीसी ‘रेल नीर’ का उत्पादन एवं वितरण करती है। ₹15/- अधिमूल्य की बोतल पर विक्रेता महज 10 से 15% कमाता है। वहीं अवैध ब्रैंड की बोतल पर उसे 100% कमाई है। अमूमन प्रत्येक आम रेलयात्री, पानी बोतल चाहे रेल नीर की हो या कोई अनब्रांडेड, सीधे ₹20/- में ही खरीदता है। हो सकता है, समस्या छुट्टे पैसे की है, न कोई विक्रेता ₹5/- लौटाता है, न ही खरीददार उससे लौटाने की अपेक्षा रखता है। यहाँ पर रेल विभाग अपने ब्रैंड रेल नीर की कीमत ही क्यों न ₹20/- कर दे? इससे एक छुट्टे लेनदेन की मुसीबत खत्म हो जाएगी दूसरा विक्रेता का कमीशन बढ़ेगा, ग्राहक को संतुष्टि रहेगी उसने उचित दाम देकर खरीदा और रेल प्रशासन चाहे तो उस अतिरिक्त दाम का उपयोग अपने सुरक्षा निधि, यात्री बीमा के लिए भी कर सकती है।

रेलवे स्टेशनोंपर अधिकृत वेंडर्स के लिए GPS और आधार बेस्ड आई डी कार्ड बनवाए जाए। इससे रेल सुरक्षा अधिकारियों को यह पता रहेगा, रियल टाइम में कितने वैध विक्रेता काम कर रहे है और इसके अलावे बाकी सारे अवैध है।

किसी भी सूरत में बिना पैक खाना न बेचा जाए, चाहे वह नाश्ता हो या भोजन या फिर फल। समोसा, कचौड़ी या पुड़ी भाजी सारी खाद्य सामग्री उत्पादन तिथि और मूल्य की लेबलिंग के साथ पैकिंग कर बेची जाए। चाय, कॉफी, दूध इत्यादि के लिए केवल प्रमाणित वेंडिंग मशीन्स ही वैध रहना चाहिए। खुली थर्मास से बेची जाने वाली चाय, कॉफी तुरन्त ही बन्द की जाए।

स्टेशनोंपर जब गाड़ी पहुंचती है तब देखिए, कितने वेंडर्स अपना सामान आवाज लगा कर बेच रहे होते, क्या यह सब अनुज्ञप्ति प्राप्त लोग होते है? क्या इनकी सामग्री मान्यताप्राप्त है? आजतक किसी पर्यावरण, मानवता वादी संगठन का रेलवे स्टेशनोंपर खुले में बेचे जाने वाले खाद्य सामग्री पर ध्यान ही नही गया होगा। मुख्य मार्ग के जंक्शन स्टेशनोंपर खानपान इकाई का, एक एक दिन का एक एक लाख रुपयोंका लेनदेन हो जाता है। खानपान की खुली सामग्री अर्थात आलूबड़ा, कचौड़ी, समोसा, पूड़ी भाजी इत्यादि मानक के अनुरुप है या नही, सामग्री का वजन उसका उत्पादन कैसे हुवा, कहाँ हुवा इसका भी कोई भरोसा नही।

इंटरनेट से साभार। यह प्रतीकात्मक तस्वीर है, ऐसे कई अवैध वेंडर्स आपको रेल के साधारण वर्ग के द्वितीय श्रेणी से वातानुकूलित उच्च आरक्षित वर्ग के कोचों तक अपनी सामग्री धड़ल्ले से बेचते नजर आएंगे और हैरानी की बात है, यात्री भी इनसे बिना किसी खौफ के सामग्री खरीदते है।

ऐसी स्थिति में बिना बिल के, यात्री सामग्री खरीदता है और उसे खाकर यदि बीमार हो जाए, उसे अन्न विष बाधा हो जाए तो क्या रेल प्रशासन इसके लिए जिम्मेदार नही? रेल प्रशासन के दायरे में रेलवे स्टेशन, प्लेटफार्म, चलती हुई गाड़ियाँ सम्मिलित है। और उनकी पुरी जिम्मेदारी है, गाड़ी में एक भी बिना अनुज्ञप्ति प्राप्त विक्रेता चले या अपनी निकृष्ट दर्जे की सामग्री बेचें। साथ ही साथ यात्री की भी जिम्मेदारी बनती है। उन्होंने भी बिना बिल के खाद्य सामग्री नही खरीदनी चाहिए और न ही अवैध विक्रेता से कोई माल खरीदना चाहिए। इस तरह का व्यवहार उसके जान माल की सुरक्षा पर प्रश्नचिन्ह लगा सकता है।

यह जरूरी हो जाता है, रेल प्रशासन अब तो अपनी सुरक्षा व्यवस्था को चाक-चौबंद कर ले। अवैध विक्रेता और उसकी सामग्री पर नकैल कसे, उनपर क़ानूनी कार्रवाई करें और यात्रिओंको सुरक्षित महसूस करवाए।