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19811/12 कोटा इटावा कोटा 21/22 मई से नियमित चलेगी

गुना में माननीय रेल राज्यमंत्री दर्शना जरदोष के निरीक्षण दौरे के बीच पत्रकारोंसे जो वार्तालाप हुवा, उसके बाद तो क्षेत्र के रेलयात्रियों की इस गाड़ी के पुनर्स्थापित होने के उम्मीद ही छूट चुकी थी। आज जैसे ही पमरे का यह परिपत्रक जाहिर हुवा तो एक खुशी की लहर सी दौड़ गयी।

रेल प्रशासन को यह ज्ञात होना चाहिए, स्थानीय यात्रिओंके लिए इस तरह की रेलगाड़ियां कितनी महत्वपूर्ण है। रेलवे अपने कैल्क्युलेशन केवल आरक्षित टिकटोंकी बिक्री पर करती है और कम अंतर की गाड़ियोंमे एक तो आरक्षित कोच रहते नही और रहे भी तो यात्री उनमे बढ़चढ़ कर बुकिंग करते नही। अतः ऐसी गाड़ियोंकी आय, गाड़ियाँ भर भर कर चलती हो तब भी दिखती नही। शायद यही कारण है, रेल प्रशासन को यह गाड़ियाँ अनुत्पादक लगती है। खैर, आप समयसारणी नोट कीजिये,

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अपना सिक्का खोटा हो तब ही तो आधी कीमत में चलाने की कोशिश होती है!

क्या आप उपरोक्त बयान को रेल द्वारा पूरे पैसे लेने के बावजूद टिकट पर छपे, “केवल 57% ही किराया चार्ज कर रहे है” इससे तो नही न जोड़ रहे? अरे हम कहत रहे है, बेशक जोड़िए, का है की भैया, हम को तो कौनो रियायत नही मिलती रेल किरायोंमे और जब हम पूरा किराया देते है और ऊ लोगन कहते है, हमरा 43 प्रतिशत किराया दूसरे लोगो की जेबन से आवत रहा तो हमको बड़ा गुस्सा आता है। माथा भनभना जात है। क्यूँ भई, हमने आपको कहा, की हमसे आधा ही किराया लेव? पूरा पैसा जो आपने मांगा हमने दिया, साथ ही आपके फलाने, ढेकड़े टेढ़े मेढ़े चार्जेस उ भी दे दिए मगर जौन व्यवस्था आप देवे का करी उसमे आप बराबर कटौती करते रहे।

द्वितीय श्रेणी या स्लीपर क्लास अब तो सारे ही आरक्षित वर्ग है मगर जितनी सीटें उतनी ही सवारी होना चाहिए की नही? मगर ऐसा होता है भला? भैया दुगुनी, तिगुनी सवारियाँ डिब्बे में ठूंसी रहती है। बराबर हिसाब जमा लेते हो आप। द्वितीय श्रेणी, स्लीपर में आधा किराया ही वसूलते हो तो सवारी भी तो दुगुनी भरोगे, है नी?

हम एक सनीमा में डाइलॉग सुने थे, ” प्रशासन अगर चाहे तो एक जोड़ी चप्पल भी किसी मंदिर के बाहर से चोरी नही हो सकत है” उ ही बात हियाँ पर भी लागू है। रेल में चाय, समोसा, कचौरी बेचने वाले सिर्फ गाड़ी के यात्रिओंको ही दिखते है, रेल के चौकीदारोंको नही। भिक मांगनेवाले, तृतीय पंथी जो जबरी टैक्स सवारियों से झपटते है, कहते है, अभी तो मुद्दल ही जमा हुवा है, अपना जेब तो इसके आगे भरेगा। तो भई, यह मुद्दल मुद्दल है वह किस रास्ते, कौनसे कलर की जेब मे जाएगा? पानी बोतल तो अब ऑफिशियल ₹20/- का कर दे रेल वाले, कमसे कम रोज की 15 की बोतल 20 में ली यह शिकायत तो बन्द हो जाएगी।

रेल प्रशासन ने कई रियायतें बन्द कर दी। ठीक है। मगर कुछ रियायतोंके बन्द करने के बजाय सभी रियायतोंको गैस सिलेंडर वाली सब्सिडियोंके ( फिलहाल तो आती नही, मगर जब आ रही थी वैसे ) जैसा अकाउंट से जोड़ दीजिये न? पूरा मूल्य देकर टिकट खरीदिये, 8 दिनोंके भीतर आपकी रियायत सब्सिडी के रूप में आपके अकाउंट में जमा हो जाएगी। इससे एक होगा, झूटी रियायतें लेकर वातानुकूलित वर्ग में घूमनेवाले यूँही गायब हो जाएंगे।

दूसरा इन दिनों रेल गाड़ियोंमे वातानुकूलित कोच में पानी बोतल का गोरखधंधा बड़े धड़ल्ले से चलता है। वातानुकूलित कोच के अटेंडेंट वाले कम्पार्टमेंट इन्ही बोतलोंसे भरे रहते है। अधिकृत सेवकोंके साथ उनके हेल्पर (?) यह बोतले बेचकर एक एक फेरे में हजारों रुपये छापते है। यह सारा जुगाड़ बड़े वरदहस्त रहे बगैर होना मुमकिन ही नही। रेलगाड़ियोंमे ऐसे धंदे तो प्लेटफॉर्म्स पर भी कुछ अलग अवस्था नही है। रेल अफसरों को यकीन नही आएगा, उनके नाक के नीचे 10 पंजीकृत वेण्डरों की जगह 100 वेण्डर अपना पेट भरते है।

शीर्षक वाला बयान हमारे गंगारामजी का है, जो वर्ष में दो बार पक्का मुम्बई से गोरखपुर जाना आना करते है। उनका यह कहना बिल्कुल वाजिब लगता है, रेल प्रशासन सारी बातें जानता है, समझता है तब ही तो शर्म के मारे आधे किराये लेता है अन्यथा तेजस, गतिमान, हमसफ़र, वन्देभारत गाड़ियोंमे क्यों नही कहता की आपका 43% किराया अन्य लोग भर रहे है? क्योंकि यह गाड़ियोंकी व्यवस्था चाकचौबंद है। वहाँ साधारण मेल/एक्सप्रेस गाड़ियोंके जैसी पोलम पट्टी नही चलाई जाती।

शायद इसलिए रेल प्रशासन अपनी यात्री गाड़ियोंमे बदलाव करना चाहता है। वन्देभारत समान गाड़ियाँ ज्यादा से ज्यादा लाने का प्रयत्न कर रहा है। क्योंकि मेल/एक्सप्रेस गाड़ियोंमे अब व्यवस्थाओंको मुस्तैद करना याने पानी सिर के ऊपर हो गया है। एक तरफ मा. रेलमंत्री ने कह दिया है, जो गाड़ी कमाई ला कर देगी वही चलाई जाएगी। तो इसका इलाज सिर्फ यही है, की अपनी जाँच और सुरक्षा व्यवस्था मजबूत कर लीजिए, आपकी आय कहाँसे फिसल रही है, यह बहुत जल्द सामने आ जायेगा।

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मतलब, अनावश्यक रियायतोंके, सब्सिडियोंके दिन ढल गए!

रेल प्रशासन ने अपनी नीति बदल, बढ़ते घाटे का बोझ अब झटकने तैयारी कर ली है। माननीय रेल राज्यमंत्री दर्शना जरदोश WCR पमरे के गुना स्टेशन निरीक्षण दौरे पर आयी हुई थी। वहाँ पत्रकारोंसे जो वार्तालाप हुवा, उसकी विस्तृत खबर दैनिक भास्कर के संस्करण में छपी है। पहले आप निम्नलिखित खबर पढ़ लीजिये,

दैनिक भास्कर, गुना के सौजन्य से

संक्रमण के यात्री गाड़ियाँ बन्द के बाद, यज्ञपी कई गाड़ियाँ चल पड़ी मगर कुछ ऐसी नियमित गाड़ियाँ भी है जिसके बारे में रेल प्रशासन गहरी चुप्पी साधे था। गुना में जब पत्रकारोंको रेल मंत्री से रूबरू बात करने का मौका मिला तो उन्होंने जनमानस की चिन्ता दर्शनाजी के सामने रख दी और जवाब भी मिला और ऐसा मिला की सारे देशभर में जो यात्री अपनी बन्द पड़ी गाड़ियोंका इन्तजार कर रहे थे अब उनकी उम्मीदोंपर काले बादल छा गए। अब उनको यह तलाशना होगा, क्या उनकी बन्द पड़ी रेलगाड़ी, जो अब तक चालू नही हो रही है क्या उसके पीछे का कारण उसकी कम कमाई तो नही?

दरअसल रेल प्रशासन ने अपने कार्यप्रणाली में सुधार करने हेतु देश की प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग शिक्षण संस्था आईआईटी मुम्बई से सलाह ली और उसके तहत ZBTT अर्थात शून्याधारित समयसारणी का एक कार्यक्रम तय किया। इस शून्याधारित समयसारणी में अनेकों यात्री गाड़ियाँ बन्द करने, सवारी गाड़ीयोंको एक्सप्रेस में बदलने, अनेकों पडावोंको रदद् करने और नियमित गाड़ियोंकी समयसारणी को शून्य समय से पुनर्निर्धारण करने की बात रखी गयी है। माननीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने हाल ही में वरिष्ठ नागरिक के साथ अन्य कई रेल टिकट रियायतोको स्थगित ही रखे जाने का समर्थन किया था और अब रेल राज्यमंत्री का यह सपाट बयान।

मित्रों, रेल प्रशासन अब जनतुष्टीकरण राजनीतिक निर्णयों से उठकर, कडी नीति अपनाकर अपने घाटे से उबरने की तैयारी कर रहा है। कई रदद् हुए पड़ाव फिर से पुनर्स्थापित तो हुए है मगर अस्थायी रूप में 6 – 6 माह तक दिए जा रहे है। सवारी गाड़ियाँ जारी तो हो रही है मगर समयसारणी बदलकर, और एक्सप्रेस की किराया श्रेणी में हो रही है। आखरी नियमित समयसारणी वर्ष 2019 में आयी थी और अब 2022 चल रहा है। सारी यात्री गाड़ियाँ अस्थायी, बिना छपे समयोंमे चलाई जा रही है। रेल प्रशासन केवल एक सूचना जारी करती है, और समयसारणी, मार्ग, पडावोंकी सूची बदल जाती है। क्या यात्री अब यह समझले, यह सब अस्थायी कार्य प्रणाली ही उसके रेल जीवन का हिस्सा बनकर रह जाएगी या आनेवाले दिनोंमें कुछ और भी अनचाहे अकल्पित लगनेवाले निर्णयोंको उसे झेलना होगा?

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आखिर, रेल प्रशासन करे तो क्या करें?

उज्जैन की घटना बस कल परसों की ही है। एक ग्रामीण महिला अपने तीन बच्चोंके साथ उज्जैन से सीहोर जानेवाली गाड़ी में चढ़ी। पति पीछे टिकट खरीदकर आ रहा था। गाड़ी निकल पड़ी। महिला पता नही पति गाड़ी नही पकड़ पाएगा ऐसा सोच अकेले यात्रा करने से डर गई, या टिकट नही होने की वजह थी, उसने क्या सोचा, क्या समझा बस चलती गाड़ी से सामान फेंका, अपने एक – एक कर बच्चे को गाड़ी से फेंका और आखिर वह भी चलती गाड़ी से कूद गई। इस भयावह घटना मे राहत की बात यह थी की कोई जानमाल की नुकसानी नहीं हुई।

यह घटना, महिला का बिना टिकट यात्रा का डर कहें या और कुछ मगर चलती गाड़ीसे बच्चों को फेंकना, फिर कूद जाना यह बात आम यात्रीओंके लिए विचार करने को मजबूर कर देने वाली घटना थी। रेलवे हमेशा से कहती है, आम यात्रिओंके लिए जाहिर सूचनाएं देती है। रेल गाड़ी में सवार होने के लिए, स्टेशन पर गाड़ी के समय से, 30 मिनट पहले आये, उचित टिकट के बिना रेलवे के अहाते तक मे प्रवेश न करे। चलती गाड़ी मे न चढ़े, न उतरे। अन्य प्लेटफार्म पर जाने के लिए ऊपरी पैदल पुल का उपयोग करे।

अब यह बातें और किस तरह कहनी चाहिए? क्या रेल प्रशासन यह कहें की आप गाड़ी मे गैरकानूनी तरीकेसे चढ़ गए है तो डरिए नहीं, क्योंकी सिर्फ आप ही बिना टिकट गलतीसे यात्रा नही कर रहे अपितु कई निगरगट्ट और शर्मोहया त्याग चुके लोग गाड़ी में जानबूझकर भी बिनाटिकट चढ़े हुए है। उन्हें तो पकड़े जाने का कोई डर ही नही लगता, 5 -50 के टिकट की ऐवज में 1000-500 का जुर्माना या कभी हाथोंमें रस्सी डालकर पुलिसकर्मियों के साथ बारात, फिर हवालात। इतनी बात से उन्हे डर नहीं लगता। बड़े बेडर, फिर आप क्यों डरते हो? क्या यह कहें रेलवे?

या यह कहे, सामने के प्लेटफॉर्म पर तो जाना है, देखिए, सैकड़ो लोग झट छलांग लगा कर दूसरे प्लेटफार्म चढ़ जाते है। कभी गिरते है, कभी रेल से टकराते है, कटते है, कभी कभार मरते भी है। जान जोखिम में डालते है मगर सीढियां चढ़ने की मेहनत बचा लेते है।

चलती गाड़ी से चढ़ना/उतरना तो कई यात्री अपनी शान समझते है। कहते है, जहां हम गाड़ी छोड़ते है, वहां से बाहर जाने का रास्ता पास पड़ता है। समय की बचत होती है। फिर पान के ठेले पर 15 मिनट बतियाते रहेंगे, मगर गाड़ी से वही उतरेंगे जहां एग्जिट पॉइंट पास हो। इनकी पत्नी, बच्चे, मातापिता घर राह देखते रहते है, हमेशा तो ईश्वर की कृपा और मातापिता के आशीष से सलामतीसे घर पहुंच जाते है। एखाद बार चलती गाड़ी से उतरते वक्त गलती से, हड़बड़ाहट में फिसल गये तो? कहीं प्लेटफॉर्म पर कुछ अनजान कचरे, केले के छिलके से, सामान से या असमान जमीन से सामना हो गया और प्लेटफॉर्म एव गाड़ी के बीच की जगह मे गिर गए तो? है? ऐसा कभी होता है भला? क्योंकि ऐसे यात्री तो मिल्खा सिंग से भी तेज भाग सकते है, छलाँग लगाने मे इनकी क्षमता ऑलम्पिक दर्जे की होती है और शरीर ऐसा की दारासिंह जितना मजबूत। गिर भी गए, रेल के चपेट मे भी आ गए तो भी कट नही पाएंगे, क्यों? मगर हर यात्री इन यात्रीओं की तरह सुपर या स्पाइडरमॅन थोड़े ही होता है?

दूसरा, कई यात्री रेल्वे कोच को अपने घर की तरह समझते है। सामने के यात्रीओंके आसन पर पैर रख बैठना, अपने मुँह मे ‘केसरी’ सूखा मेवा चबा चबा कर, उसका ‘केसरी रस’ कोच के अंदर ही किसी कोने मे छिड़कने के लिए कोना ढूंढते रहते है। आप को पता तो होगा ही हल्का होने के लिए कौन कोना ढूंढते रहता है? समझदार हो, तो शायद अपने घरों की दीवारों, झरोकों और दरवाजों के पीछे भी यह सन्माननीय यात्री इसी तरह से रंगरोगन किया करते होंगे। अब ऐसा है की, रेल्वे तो इनको इनकी अद्भुत कलाकृतियों के चलते पुरस्कृत (?) भी कर दें मगर यह मॉडर्न पिकासो इतने शर्मीले और प्रसिद्धी पराङ्मुख होते है की ना ही अपने उस मॉडर्न आर्ट पर ऑटोग्राफ करते है न ही जाहीर करते है की वह इस अनुपम चित्रकारी के चित्रकार है।

मित्रों, रेल यह हमारी, आपकी अपनी संपत्ति है। इसका उपयोग हमे सबके साथ मिलकर करना है अत: जितना हम अपने लिए साफसुथरा चाहते है उतना ही औरों के लिए भी सोचें। रेल प्रशासन आपके लिए जो सूचनाए देता है, वह निश्चित ही आपके सुरक्षा हेतु है। रेल गाड़ी अपने दायरे से बाहर आपको नुकसान करने कभी नही आती, आप अपनी लापरवाही, बेपरवाह व्यवहार से उसके दायरे में जाते है और अपनी जान जोखिम में डालते है। जिस तरह आग, पानी, हवा, यंत्र का उपयोग हम सावधानी से करते है, उसी तरह रेलवे भी यांत्रिक साजोसामान है, जिसके उपयोग की कुछ नियम और पद्धति है, यदि यात्री इसके उपयोग के तरीके का सन्मान नही करेगा तो नुकसान भी उठाना पड़ सकता है और यह हानि आपके जान तक की भी हो सकती है।

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नान्देड़ अमृतसर नान्देड़ सचखण्ड एक्सप्रेस मे भारी बदलाव। हो रही डाउन में डाउनग्रेड, मार्ग भी बदलेगा।

12715/16 नान्देड़ अमृतसर नान्देड़ सचखण्ड प्रतिदिन एक्सप्रेस की समयसारणी, मार्ग और साथ ही यात्रिओंके मन मे था वह रुतबा बदल रहा है। नान्देड़ से नई दिल्ली, चंडीगढ़ होते हुए अमृतसर को जानेवाली सचखण्ड एक्सप्रेस अब सितम्बर के पहले सप्ताह से अमृतसर को 1 घण्टा देरीसे पहुंचेंगी और अब चंडीगढ़ होकर नही चलाई जाएगी। दोनों दिशाओंसे अब यह गाड़ी चंडीगढ़ की जगह सरहिंद होकर चलेगी।

कृपया निम्नलिखित समयसारणी और बदलाव जारी होने की तिथियां देख लीजिए।