भारतीय रेल एक ऐसा विभाग है, जिसमे सदा मांगपत्र लगे ही रहते है। हम आरक्षण, आसन व्यवस्था की बात नही कर रहे है वह तो एक पूरा लम्बा विषय बन सकता है, अपितु गाड़ियाँ, स्टोपेजेस की मांग इत्यादि विषय हमारे विचार में है।
आज से कुछ वर्षोँ पूर्व तक, यूँ कहिए की सोशल मीडिया सक्रिय, अतिसक्रिय नही था तब तक यह मांगे केवल स्टोपेजेस या नई गाड़ियोंकी ही होती थी। अब यात्री संगठन और रेल इन्थुएसिस्ट ( यह नई जमात है, इन्थुएसिस्ट का अर्थ है उत्साही) ही मांग करते है और इस कदर करते है की जैसे उनके जन्ममरण का प्रश्न हो, यह मांग पूरी नही होगी तो कोई आसमान ही टूट पड़ेगा, शायद हजारों लोगोंकी रोजीरोटी छीन जाएगी, रोजगार डूब जाएंगे और क्या क्या! 😊
यह अतिउत्साही (?) यात्री आजकल न सिर्फ नई गाड़ियोंकी मांग रखते है बल्कि साथमे उनकी समयसारणी, रैक लिंक इत्यादि भी बनाने मे तत्पर रहते है। फलाने गाड़ी को LHB कर दीजिए, फलाने गाड़ी का रैक शेयरिंग बदल दीजिये, अमुक स्टेशनपर रखरखाव के हेतु शेड बनवा दीजिये। हाँ, आजकल वह “पीट लाइन” की बड़ी मांग की जाती है और बहुतों माँगवादीयोंको 😊☺️ पिटलाइन का अर्थ ही पता नही रहता। बस यह सुना हुवा रहता है, की स्टेशनपर पिटलाइन नही रहने से उसे टर्मिनेटिंग स्टेशन नही बनाया जा सकता है या सीधे शब्दोँ में वहाँसे कोई गाड़ी शुरु नही की जा सकती है।
दरअसल किसी भी रेलवेस्टेशन पर रेल इन्फ्रा के नाम पर कमसे कम दो रेलवे लाइन, स्टेशन बिल्डिंग, प्लेटफॉर्म्स यह मूलभूत सुविधा रहती है। जंक्शन स्टेशन पर इनकी संख्या आवश्यकता के अनुसार बढ़ती है और ट्रेन टर्मिनेटिंग स्टेशनोंपर स्टैबलिंग लाइन, पीट लाइन, स्टैबलिंग यार्ड, मेंटेनेंस शेड इत्यादि सुविधाए बढाई जाती है। यह एक एक इन्फ्रास्ट्रक्चर अर्थात बुनियादी सुविधाओंके न केवल जमीनी जगह बल्कि प्रशिक्षित कर्मी, निधियों के आबंटन की भी आवश्यकता रहती है। स्टैबलिंग लाइन याने जिस गाड़ी का परिचालन पूरा हुवा उसे टर्मिनेटिंग स्टेशन पर पीट लाइन पर रखरखाव के लिए ले जाने हेतु खड़ा किया जाता है। यहाँसे गाड़ी रखरखाव हेतु पीट लाइन जाएगी। स्टैबलिंग यार्ड याने गाड़ी का अस्थायी पार्किंग स्थल। पीट लाइन याने वह जगह जहाँ पर गाडीका सघन रखरखाव किया जाता है। पीट याने गढ्डा, पीट लाइन याने पटरी के बीच एक गढ्डे की व्यवस्था जिसमे लाइट्स भी लगे हो और मेंटेनन्स करनेवाले प्रशिक्षित कर्मचारी उसमे उतर कर गाड़ी की किसी भी समय (राउंड द क्लॉक) सघन जांच कर सके। पीट लाइन के आजूबाजू में पूरी गाड़ी में चढ़ने/उतरने के लिए प्लेटफॉर्म सदृश्य रैम्प बने होते है। लाईट्स की सुविधा होती है।
रेल प्रशासन इन लोगोंकी इस तरह की मांगोंको देखकर चकित रह जाता है। चूंकि पीट लाइन, मेंटेनेंस शेड इत्यादि बुनियादी सुविधाओं का निर्माण सीधी मांग करने जितना सहज नही है। बुनियादी व्यवस्थाके प्रस्ताव उच्चतम अधिकारी किया करते है और निर्णय मंत्रालयाधीन होते है। लेकिन हमें नई गाड़ी चाहिए, गाड़ी नही मिलने की वजह पीट लाइन की अनुपलब्धता है तो पीट लाइन चाहिए और रखरखाव यह वजह है तो मेंटेनेंस शेड बनवा दीजिये। हनुमानजी की पूँछ की तरह एक दूसरे से जुड़ी मांगो की सूची बढ़ती चली जाती है।
आप जानकर चकित रह जाओगे की किसी भी बुनियादी व्यवस्थाके निर्माण के लिए 16 तरह की बेसिक अप्रूवल स्टेजेस है और उनको पार करने के बाद किसी स्टेशनको यह सुविधा उपलब्ध कराई जा सकती है।
मित्रों, यह एक सूची मेरे टेलीग्राम ग्रुप मित्र श्री अभिषेक गोपाल द्वारा प्राप्त हुई है जो सम्भावित सूची है। आशा करता हूँ, आप इसे आखिर तक पढ़ें और अन्त तक होश में ही रहे। ☺️
1) परियोजना शुरू होने से पहले उसकी संकल्पना का अनुमोदन
2) डीपीआर ( डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट) की मंजूरी
3) निधि स्वीकृति ( प्रत्येक वित्तीय वर्ष में होता है और ऐसा आनेवाले प्रत्येक वर्ष में भी करना पड़ता है।)
4) सभी हितधारकों द्वारा ड्राइंग/डिजाइन का अनुमोदन
5) पर्यावरण मंजूरी
6) स्थानीय निकाय की मंजूरी (राज्यों के आधार पर कई हैं)
7) वायु और जल अधिनियम की मंजूरी
इसके बाद शुरू होती है निविदा प्रक्रिया
8) निविदा अनुमोदन
9) निविदा स्वीकृति
10) प्रारंभ अनुमोदन
11) विनिर्देशों की स्वीकृति
12) नमूने अनुमोदन
13) विचलन / भिन्नता अनुमोदन (कार्य करते करते कुछ बदलाव करने पड़े तो)
प्रोजेक्ट पूरा होने के बाद भी…
14) निर्माण के बाद स्थानीय निकाय की मंजूरी का एक और दौर
15) सौंपना (जो विडंबना है, की लाख मंजूरी/अनुमोदन प्रक्रियाओंसे गुजरने के बाद फिर से किसी से अनुमोदन की आवश्यकता है !!)
16) यदि इन सब से बचने के बाद लागत बढ़ जाती है (जो हमेशा होती है) तो वृद्धि अनुमोदन।
अब आप बता सकते है, की जिन बुनियादी ढांचों की मांगो को बोलने में हमे जरा सा भी वक्त नही लगता, उसे अप्रूव्ह कराने में कितने पापड़ बेलने होते है!
वहीं बात स्टोपेजेस या गाड़ी का विस्तार या नई गाड़ी शुरु करने की पद्धति में भी होता है। प्रत्येक गाड़ी, मालगाड़ी, शंटिंग, रखरखाव इसका एकदम नपातुला कम्प्यूटरीकृत प्रोग्राम सेट किया हुवा रहता है। उठ के यात्री सन्गठन अपनी मांग रख देता है, फलाने स्टेशन पर गाड़ी रुकवा दीजिए और ट्रेन्स शेड्यूल प्रोग्रामिंग में सारी व्यवस्था फिरसे जोड़ना पड़ता है।
कोई कहता है, हमारा नेता ऊपर जाता है और काम कर लाता है। दरअसल यह सारा दबाव का नतीजा है वरन ट्रेन्स शेड्यूल सॉफ्टवेयर में इसकी गुंजाईश बहोत बहोत कम रहती है। किसी भी नई गाड़ियोंके लिए सॉफ्टवेयर उसके अतिरिक्त इन्फ्रास्ट्रक्चर की मांग करता है। इन्फ्रास्ट्रक्चर अर्थात रेल लाइन बढाना, प्लेटफार्म बढाना और वही आपकी ‘पीट लाइन्स’ बढाना इत्यादि मांग रहती है। जब भी नई गाड़ी या स्टोपेजेस की मांग उठी तो रेल अधिकारी इसी सॉफ्टवेयर में झाँक कर उत्तर दे देते है, भाई आपके यहाँ पीट लाइन नही है अतः आपकी मांग पूरी नही हो सकती।
यहॉं हम बिना किसी राजनीति युग का समर्थन करते हुए सहजता से कह सकते है की वर्ष 2014 के बाद रेल इन्फ्रास्ट्रक्चर में बहुत आश्चर्यजनक तेजी से, एक विशेष धोरण के साथ बदलाव लाया गया है। हम स्टेशनोंकी साफसफाई देखते है, स्टेशनोंपर बदले इन्फ्रास्ट्रक्चर में रैम्प, लिफ्ट्स, एस्कलेटर देख सकते है। एक वक्त था की बड़े जंक्शन पर रैम्प की मांग पर पूर्तता हेतु रेल अधिकारी अपनी विवशता बताते थे और आज छोटे छोटे जंक्शन स्टेशनोंपर भी दो-दो FOB पुल, रैम्पस, लिफ्ट, बैटरी चलित कार आदि सुविधाओंका प्रावधान उपलब्ध कराया जा रहा है।
मित्रों, हमारा इतना बड़ा देश और उतनी ही बड़ी जनसंख्या। ऐसे में नई गाड़ियोंकी, स्टोपेजेस की मांग रहना बहुत स्वाभाविक है मगर वही मांग इन्फ्रास्ट्रक्चर की हो तो उसके लिए रेल इंजीनियर्स की अलग फौज रेल विभाग के पास होती है। रेल परिवहन की भी अपनी मर्यादा है। जल या वायु मार्ग के लिए मार्ग निर्माण का प्रश्न ही नही तो सड़क परिवहन के लिए निर्मित सड़क पर सभी तरह के वाहन चल सकते है, लेकिन रेल परिवहन में मार्ग, वाहन सब विशिष्ट, उसके चालक, रखरखाव प्रत्येक मद विशिष्ट ही है। रेल के अलावा किसी भी अन्य वाहन के लिए रेल इन्फ्रास्ट्रक्चर का कोई उपयोग नही। बनने के बाद भी वाहन उपलब्ध कराना, प्रशिक्षित कर्मियोंकी लाइन खड़ी करनी पड़ती है और यही बात सड़क इन्फ्रास्ट्रक्चर को रेल इन्फ्रास्ट्रक्चर के ऊपर रखती है की जिसके निर्माण के साथ ही लोग अपने वाहन दौड़ाना शुरु कर देते है। खैर, आज बस इतना ही!
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