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Akola – Khandwa Gauge conversion controversy.

This complete story picked from twitter account.

courtesy @Krunal_Goda

Let’s Understand Issue in detail:

Salient features of Akola-Khandwa Gauge conversion line.

Existing Railway line is of Meter Gauge laid in 1959-60.

• Meter Gauge train operation was stoppd from 1-1-17 in Akola-Khandwa section for Gauge Conversion work.

• Thus, Railway line is very old and Railway track, Operation of trains & Wild animals were co-existing without any problem upto Dec’16.

• Akola-Khandwa portion is part of 473 Km long Gauge Conversion project from Akola to Ratlam.

• 299 Km length of the project falls in Madhya Pradesh, out of which, 198 Km length has already been converted into Broad Gauge and commissioned for train services. The work of Gauge Conversion in balance 101 Km length is in progress.

• 174 Km length of the project from Akola to Khandwa falls in Maharashtra State.

• Out of 174 Km, the Gauge conversion work on 43 Km length of project from Akola to Akot has already been completed and expected to be commissioned by Aug’2020.

• The Gauge Conversion work in 53 Km length from Amlakhurd-Khandwa is also in progress.

• The Work of Gauge Conversion in sandwiched portion of 78 Km length from Akot to Amlakhurd is pending on account of pending Wildlife clearance.

• Conversion of Meter Gauge to Broad Gauge is extremely essential to provide connectivity b/w Southern & Western India.

• 17 Km length of existing Meter Gauge section b/w Adgaon Buzurg & Tukaithad Railway stations passes through Amba Barwa / Wan Reserve Forest.

This was declared as “Sanctuary” in 1998 and had become part of Melghat Tiger Reserve.

• Out of total 78 Km length of stretch from Akot to Amlakhurd, 39 Km passes through Wan Reserve forest, Melghat Tiger Reserve and its buffer zone.

• Is it true that@RailMinIndia wanted to ease curvature of existing alignment, but, Forest Deptt. of Maharashtra rejected the proposal?

• May be, hence study was done for alternate alignment bypassing Tiger Sanctuary by taking help of Regional Remote Sensing Center Nagpur

As per study:

– Due to diversion, 30Km extra length was required to b constructed

– Acquisition of 152 Hec. Virgin forest land + 270 Hec. Revenue land was involved

– Around 0.5 Hec. built-up area was also required to be acquired

  • Tunnel of 7 Km length also required

Fresh land acquisitn of Forest, Revenue land, construction of tunnel wild take longtime & huge cost, hence experts decided to follow existing alignment within existing Railway land boundary w/o acquisition of land specially in Reserved Forest area & Melghat Tiger Reserve

May be, hence Railway is not acquiring any land in Reserved Forest area & Melghat Tiger Reserve.

• In 2014 itself, Railway informed both Govt. of Maharashtra and Forest Deptt that, Railway will bear the cost of any Mitigation measures required by the Forest Deptt.

Like avoiding the blasting, quarrying and mining in forest areas, providing underpass and overpass etc. on identified locations for animal movement.

Railway also agreed that, the speed of Broad Gauge train shall be kept same as of Meter Gauge train i.e. 60 Kmph.

So, To summarise as it looks:

Railway would be working within Railway alignment in the Reserved Forest area & Melghat Tiger Reserve without acquisition of any extra land.

Had the alignment be modified then, huge Virgin forest & Revenue land would need to be acquired, which is quite daunting task and very costly affair as well and will delay the project by around 6 to 7 years.

Up to Dec’2016, Wildlife animals were co-existing with Meter Gauge train operation & no untoward incident ever reported.

Since, Railway agreed for providing mitigation measures, appropriate work would be done to assure free movement of animals across track.

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अकोला – आकोट – खण्डवा का बड़ी लाइन मे रूपान्तरण, क्या अब ऐसे होगा?

1963 में शुरू हुई रतलाम – महू – खण्डवा – अकोला इस मीटर गेज लाइन पर जयपुर काचेगुड़ा मीनाक्षी एक्सप्रेस बेहद लोकप्रिय गाड़ी चलती थी। न सिर्फ दक्षिण के राज्यों बल्कि महाराष्ट्र के विदर्भ और मध्यप्रदेश के निमाड़ मालवा इलाके लिए राजस्थान की एकमेव सम्पर्क स्थापित रखने वाली यह गाड़ी थी। अनुपम जंगल, झरने के दृश्योंसे भरपूर यह इलाका कभी घाटी तो कभी गुंफाओंसे गुजरता था।

इसी बीच रेल प्रशासन का यूनिगेज नामक एक महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट आया और देश मे जितनी अलग अलग गेज की लाइनें थी उनको एक गेज, बड़ी लाइन में रूपांतरित करने का कार्यक्रम निर्धारित किया गया। करीबन सन 2008 में राजस्थान में जयपुर – चित्तौड़गढ़ – रतलाम लाइन बड़ी की गई और आगे रतलाम महू खण्डवा अकोला यह 472 किलोमीटर का सेक्शन भी यूनिगेज प्रोग्राम के तहत गेज कन्वर्जन में लाया गया। रतलाम – इन्दौर – महू बड़ी लाइन हो कर गाड़ियाँ भी चलने लगी मगर बड़े पेंच महू – खण्डवा और खण्डवा – अकोला रेल खण्ड में फंस गए।

महू खण्डवा सेक्शन में पातालपानी, कालाकुण्ड सेक्शन का गेज वही छोटी लाइनका रख कर उसे हेरिटेज लाइन का दर्जा दिया गया और उस सेक्शन में पर्यटक गाड़ी चलाई जा रही है। महू से सनावद तक यह गेज कन्वर्शन थोड़ा लम्बी दूरी से घूम कर आ रहा है जिसका काम अभी जारी है। दूसरी तरफ खण्डवा के पास मथेला स्टेशन पर एक लूप बनाया गया और उसे सनावद लाइनसे जोड़ा गया। दरअसल खरगौन जिले में सेलड़ा गांव में NTPC का औषणिक ताप बिजलीघर बना है और उसकी कोलरीज की मालगाड़ियोंके लिए यह लाइन जल्दी बनाई गई। मथेला सनावद होकर यह कोयले से लदी गाड़ियोंका ट्रैफिक शुरू हो गया है और विद्युतीकरण भी प्रगतिपथपर है।

अब बची है बात खण्डवा अकोला 172 किलोमीटर गेज कन्वर्शन की जिसमे अकोला आकोट का काम लगभग पूरा हो गया है। आकोट से आगे यह ट्रैक 38 किलोमीटर मेलघाट टाइगर रिज़र्व से होकर गुजरता है जिसमे करीबन 23 किलोमीटर का ट्रैक बाघोंके आवाजाही का क्षेत्र है। महाराष्ट्र शासन ने इस गेज कन्वर्शन पर आपत्ति उठाई है। शासन ने कहा है, बजाय मेलघाट बाघ प्रकल्प से यह ट्रैक गुजरे, इसे थोड़ा घुमा कर ले जाना चाहिए। आकोट के बाद इस ट्रैक को जलगाँव जामोद होकर ले जाया गया तो मेलघाट प्रकल्प बाधित नही होगा और बुलढाणा जिले के लोगोंकी भी रेल यातायात की व्यवस्था हो जाएगी। नए ट्रैक बिछाने का अतिरिक्त खर्च इस यात्री यातायात के जरिए भर कर निकाला जा सकता है। देश के महत्वपूर्ण टाइगर रिजर्व में मेलघाट का शुमार होता है।

इसी से सम्बंधित मेलघाट टाइगर रिजर्व की और महाराष्ट्र शासन के इच्छानुसार ट्रैक को जलगाँव जामोद से कैसे ले जाया जा सकता है इसकी जानकारी आपको दे रहे है।

मेलघाट बाघ प्रकल्प (courtesy: melghattiger.gov.in)
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का रेलमंत्री और पर्यावरण मंत्री को पत्र
अकोला – खण्डवा पर्यायी रेल मार्ग (courtesy:indiarailinfo.com)
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तमिलनाडु राज्य के अंतर्गत चलनेवाली रेल गाड़ियाँ रद्द

निम्नलिखित 7 जोड़ी गाड़ियाँ गत 29 जून से 15 जुलाई तक रद्द की गई थी, जिन्हें अब आगे और 31 जुलाई तक रद्द किया जा रहा है।

इस तरह राज्योंसे गाड़ियाँ रद्द की जा रही है, तब 230 गाड़ियोंसे आगे और गाड़ियाँ चलनेपर एक सांवलिया निशान लग जाता है। बंगाल राज्य ने अपनी गाड़ियोंकी फ्रीक्वेंसी रोजाना से घटाकर साप्ताहिक करवा दी है तो झारखंड राज्य ने कई गाड़ियोंको अपने राज्य में आने से प्रतिबंधित कर दिया है। कर्नाटक, तामिलनाडु और ओडिशा राज्योंने अपने राज्य अंतर्गत चलनेवाली सारी गाड़ियाँ रद्द कर रखी है।

महाराष्ट्र राज्य ने गाड़ियोंके चलनेपर तो प्रतिबन्ध नही लगाया मगर राज्यान्तर्गत किसी यात्री को टिकट नही देने की व्यवस्था करवा दी, इससे राज्य में किसी एक शहर से दूसरे शहर जाने में यात्री को कई पापड़ बेलने पड़ते है। अपने शहर से जो सबसे पास का और पड़ोस के राज्य में पड़ने वाले स्टेशनसे यात्री अपनी रेल यात्रा को अन्जाम दे रहा है। जलगाँव जिले के लोग धड़ल्ले से मध्यप्रदेश के बुरहानपुर स्टेशन से जाना आना कर रहे है।

हमारा यह कहना है बन्धन जो भी हो नैतिकताओं के आधार पर ही खरे उतरते है। सरकारें लाख नियम बना ले, उसकी तोड़ निकालने वाले निकालकर कानून को मरोड़ ही देते है। जब जलगाँव, भुसावल के यात्री या महाराष्ट्र राज्य के कोई भी यात्री पड़ोस के राज्य से आना जाना कर सकते है, उतरनेवाले यात्री गाड़ी स्टेशन के बाहर खड़ी होनेपर आउटर एरिया में उतर जाते है और यह बात रेल, राज्य प्रशासन से छुपी भी नही है तो क्यों न राज्यान्तर्गत रेल यात्रा को अनुमति दी जाए? कम से कम जरूरतमंद यात्री उल्टी सीधी यात्रा की सर्कस करने से तो बच जाएंगे।

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भारतीय रेलवे प्रगति की ओर अग्रेसर

आप को यह बातें जानकर हैरानी होगी और भारतीय रेलवे पर गर्व भी होगा की रेल प्रशासन न सिर्फ यात्री सुविधा बल्कि पर्यावरण के प्रति भी अपना उत्तरदायीत्व बखूबी निभा रहा है।

भारतीय रेलवे 2030 तक “हरित रेलवे” बनने के मिशन मोड पर (शून्य कार्बन उत्सर्जन)

रेल मंत्रालय ने 2030 तक भारतीय रेलवे को पूरी तरह हरित ऊर्जा से संचालित करने का लक्ष्‍य निर्धारित करने के साथ, ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन से निपटने की दिशा में कई बड़ी पहल की है। रेलवे विद्युतीकरण, लोकोमोटिव और ट्रेनों की ऊर्जा दक्षता में सुधार के साथ स्थाई उपकरणों और प्रतिष्ठानों/स्टेशनों के लिए हरित प्रमाणन हासिल करने, डिब्बों में जैव शौचालय बनाए जाने तथा अपनी ऊर्जा जरुरतों के लिए नवीकरणीय स्रोतों पर निर्भरता तथा शून्य कार्बन उत्सर्जन को प्राप्त करना इस रणनीति का हिस्‍सा है।

दिसंबर 2023 तक सभी ब्रॉड गेज मार्गों का होगा विद्युतीकरण

भारतीय रेलवे ने 40,000 से अधिक (रूट किलोमीटर) (व्‍यस्‍त मार्गों में से 63%) का विद्युतीकरण पूरा कर लिया है, जिसमें 2014-20 के दौरान 18,605 किलोमीटर मार्ग का विद्युतीकरण कार्य किया गया है। इससे पहले, 2009-14 की अवधि के दौरान केवल 3,835 किमी मार्ग का विद्युतीकरण पूरा हुआ था। भारतीय रेलवे ने वर्ष 2020-21 के लिए 7000 किलोमीटर मार्ग के विद्युतीकरण का लक्ष्य तय किया है। व्‍यस्‍त नेटवर्क के सभी मार्गों के दिसंबर 2023 तक विद्युतीकरण करने की योजना बनाई गई है। भारतीय रेलवे आखिरी मील संपर्क और परस्‍पर न जुड़ पाए मार्गों के विद्युतीकरण पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। इसे ध्यान में रखते हुए कोविड अवधि के दौरान 365 किमी प्रमुख मार्गो का काम पूरा किया गया।

कोविड के समय में 365 किमी प्रमुख संपर्क रेल मार्ग का कार्य पूरा किया गया

कोविड की अवधि में मुंबई-हावड़ा के कटनी-सतना खंड (99 आरकेएम) को इलाहाबाद के माध्यम से हावड़ा के लिए वैकल्पिक मार्ग प्रदान किया गया है। इसी तरह इंदौर-गुना-बीना मार्ग पर पचोर-मक्सी (88 आरकेएम) खंड पर मक्‍सी-भोपाल-बीना के लिए एक वैकल्पिक मार्ग प्रदान किया गया है। हावड़ा/सियालदह-एसवीडी कटरा पर पटना मार्ग के माध्यम से, भागलपुर-शिवनारायणपुर (45 आरकेएम) अनुभाग चालू किया गया है। करियाकल बंदरगाह को तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के कोयले, उर्वरक और इस्पात संयंत्रों से जोड़ने वाले मार्ग पर, तिरुवरूर-कराइकल बंदरगाह (46 आरकेएम) खंड को इरोड, कोयम्बटूर और पालघाट के लिए बंदरगाह से जोड़ने की संपर्क लाइन बनाई गई है।

900 स्टेशनों सहित विभिन्न इमारतों की छतों पर 100 मेगावाट क्षमता वाले सौर पैनल लगाए गए हैं; 400 मेगावाट निष्पादन के विभिन्न चरणों में हैं।

भारतीय रेलवे ने सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए भी कई पहल की है। यह रूफ टॉप सोलर पैनल (डेवलपर मॉडल) के माध्यम से 500 मेगा वाट (एमडब्‍ल्‍यू्) ऊर्जा क्षमता का दोहन करने के लिए काम कर रहा है। अब तक, 900 स्टेशनों सहित विभिन्न इमारतों की छतों पर 100 मेगा वाट क्षमता वाले सौर संयंत्र लगाए गए हैं। 400 मेगावाट की संयुक्त क्षमता वाले सौर संयंत्र निष्पादन के विभिन्न चरणों में हैं। इनमें से 245 मेगावाट क्षमता वाले सौर संयंत्रों के लिए निविदाएं जारी कर दी गई हैं। दिसंबर 2022 तक इन संयंत्रों को पूरा करने का लक्ष्य तय किया गया है।

भारतीय रेलवे के पास 20 गीगावॉट क्षमता वाले सौर संयंत्र स्थापित करने के लिए 51,000 हेक्टेयर भूमि है।      

इसके अलावा, भारतीय रेलवे अपनी जमीन पर भी सौर संयंत्र लगाने की कोशिश में है।  भारतीय भारतीय रेलवे के पास 20 गीगावॉट क्षमता वाले सौर संयंत्र स्थापित करने के लिए 51,000 हेक्टेयर भूमि है। इन संयंत्रों से उत्पन्न होने वाली बिजली की केंद्र/राज्यों के ग्रिडों या सीधे 25 केवी एसी कर्षण प्रणाली को आपूर्ति की जाएगी । रेलवे एनर्जी मैनेजमेंट कंपनी लिमिटेड भारतीय रेलवे की एक संयुक्त उपक्रम कंपनी है जिसमें रेलवे की (49%) और राइट्स लिमिटेड की (51%) हिस्‍सेदारी है। इस कंपनी को रेलवे की जमीन पर लगाए जाने वाले सौर संयंत्रो का काम देखने की जिम्‍मेदारी दी गई है।

भेल के सहयोग से बीना में 1.7 मेगावाट क्षमता वाला संयत्र स्‍थापित किया जा चुका है।    

भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (भेल) के सहयोग से बीना (मध्य प्रदेश) में 1.7 मेगावाट की ऐसी एक परियोजना पहले ही स्थापित की जा चुकी है और वर्तमान में व्यापक परीक्षण की प्रक्रिया में है। यह दुनिया में अपनी तरह की पहली सौर परियोजना है। इसका उध्धटन हाल ही में माननीय प्रधानमंत्री जी ने किया।

पवन ऊर्जा क्षेत्र में, 103 मेगावाट क्षमता वाले बिजली संयंत्र पहले ही चालू हो चुके हैं; अगले 2 वर्षों में तमिलनाडु, गुजरात, राजस्थान और कर्नाटक में 200 मेगावाट क्षमता वाले पवन ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने की योजना है।    

शुरुआती स्‍तर पर भूमि आधारित सौर परियोजनाओं के लिए, भारतीय रेलवे ने तीन चरणों में 3 गीगा वाट क्षमता वाली सौर परियोजना शुरू की है। पहले चरण में ओपन एक्सेस राज्यों के लिए रेलवे भूखंडों में 1.6 गीगा वाट क्षमता के लिए 29 अप्रैल 2020 को डेवलपर मॉडल के तहत निविदा जारी की गई है। द्वितीय चरण में, रेलवे प्लॉटों में 400 मेगावाट क्षमता को आरईएमसीएल  के स्वामित्व मॉडल के तहत बिना खुली पहुंच वाले राज्यों के लिए विकसित किया जाएगा। इसके लिए 16 जून 2020 को निविदा जारी की गई है। तीसरे चरण में रेलवे की भूमि पर डेवलपर मॉडल के तहत पटरियों के साथ-साथ खुली पहुंच वाले राज्यों के लिए ट्रैक स्थापित किए जाएंगे, जिसके लिए 1 जुलाई 2020 को निविदा जारी की गई है।

पवन ऊर्जा क्षेत्र में, 103 मेगावाट पवन आधारित बिजली संयंत्रों को पहले ही चालू कर दिया गया है। इनमें 26 मेगावाट क्षमता वाली परियोजना राजस्थान के जैसलमेर में, 21 मेगावाट क्षमता वाली परियोजना तमिलनाडु में और 56.4 मेगावाट क्षमता वाली परियोजना महाराष्ट्र के सांगली में है। भारतीय रेलवे ने तमिलनाडु, गुजरात, राजस्थान और कर्नाटक में अगले 2 वर्षों में 200 मेगावाट क्षमता वाले पवन ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने की भी योजना बनाई है।

भवनों और स्‍टेशनों पर प्रकाश की व्‍यवस्‍था के लिए 100 प्रतिशत एलईडी बल्‍बों का उपयोग करन की व्‍यवस्‍था 

जलवायु परिवर्तन में अपनी भूमिका का एहसास करते हुए भारतीय रेलवे ने इमारतों और स्टेशनों में एलईडी बल्‍बों के जरिए 100 फीसदी प्रकाश करने जैसी हरित पहल शुरू की है। भारतीय रेलवे ने सीआईआईआई से अपनी 7 प्रोडक्शन यूनिट्स, 39 वर्कशॉप, 6 डीजल शेड और 1 स्टोर्स डिपो के लिए हरित प्रमाण पत्र भी हासिल कर लिया है। 14 रेलवे स्टेशनों और 21 अन्य भवनों/परिसरों को भी हरित ऊर्जा वाले भवनों के रूप में प्रमाणित किया गया है। इसके अलावा 215 स्टेशनों को पर्यावरण प्रबंधन प्रणाली (ईएमएस)/आईएसओ 14001 के साथ प्रमाणित किया गया है।

कुल 505 जोड़ी ट्रेनों में हेड ऑन जेनरेशन तकनीक का इस्‍तेमाल किया गया है जिससे प्रतिवर्ष लगभग 450 करोड़ रूपए के 70 मिलियन लीटर डीजल की बचत हो रही है।     

कुल 505 जोड़ी ट्रेनों में हेड ऑन जेनरेशन तकनीक का इस्‍तेमाल किया गया है। इससे प्रति वर्ष लगभग 70 मिलियन लीटर डीजल/ 450 करोड़ रुपये की बचत की संभावना है। रेलवे ने इसके अलावा अपनी सभी 8 उत्पादन इकाइयों और 12 कार्यशालाओं में ऊर्जा दक्षता हासिल करने के लिए सीआईआई के साथ करार के तहत पूरा किया है जिसके परिणामस्वरूप ऊर्जा दक्षता में 15 प्रतिशत सुधार हुआ है।

रेलगाडि़यों के कुल 69,000 यात्री डिब्‍बों में 2,44,000 जैव-शौचालय बनाए गए हैं।    

हरित पहल के तहत भारतीय रेलवे ने अपनी रेलगाडि़यों के कुल 69,000 डिब्‍बों में 2,44,000 से अधिक जैव-शौचालय लगाए हैं।