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दिल्ली के लिए बनेगा नया छठां रेल टर्मिनल ‘बिजवासन’

भारतीय रेल्वे दुनिया के सबसे बड़े परिवाहन नेटवर्क मे से एक है। दिनभर मे 19,000 गाड़ियां चलती है जिसमे 12,000 तो सिर्फ यात्री गाडियाँ होती है। ढाई करोड़ हर रोज का कुल यात्री यातायात भारत के 8000 रेल्वे स्टेशनों से गुजरता है। ऐसी स्थितिमे यह लाजमी है की स्टेशन्स की यात्री सुविधाए बढाई जाए, उन्नत की जाए। इसके लिए भारतीय रेल्वे ने एक आई आर एस डी सी (इंडियन रेल्वे स्टेशन डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड ) नामक उपकम्पनी बनाई जो स्टेशन्स की सुधारणाओंपर काम करती है।

हाल मे IRSDC कंपनी चंडीगढ़, हबीबगंज ( भोपाल ), शिवाजीनगर ( पुणे ), बिजवासन और आनंदविहार ( दिल्ली ), साहिबजादा अजित सिंह नगर ( मोहाली ), सूरत और गांधीनगर ( गुजराथ ) ऐसे आठ स्टेशन्स को पुनर्निर्मित करने पर काम कर रही है। यह आठों स्टेशन आंतरराष्ट्रीय दर्जे के बनाए जाने की योजना है। पुरानी स्टेशन बिल्डिंग को सुधारना या उसके आसपास की जगह लेकर नई बिल्डिंग बनाना, यात्री सुविधाए उन्नत करना, प्लेटफॉर्म्स की लम्बाई और संख्या बढ़ाना, यात्रीओं के आवागमन के लिए सरक्युलेटींग एरिया डेवलप करना और यात्रीओं को एयरपोर्ट के भांति वाणिज्यिक कॉम्प्लेक्स, शॉपिंग मॉल, एंटरटेन्मेंट हब का निर्माण करना इस तरह की यह योजनाएं है।

आज हम जिस स्टेशन की बात कर रहे है वह स्टेशन है नई दिल्ली का बिजवासन स्टेशन। यह स्टेशन उत्तर रेल्वे के रेवाड़ी दिल्ली लाइन पर स्थित है और द्वारका सेक्टर मे पड़ता है। यह पर जो नए टर्मिनल स्टेशन का निर्माण किया जा रहा है, नई दिल्ली, दिल्ली, हजरत निजामुद्दीन, दिल्ली सराय रोहिल्ला, और आनन्द विहार टर्मिनल ईन दिल्ली के रेल टर्मिनलोंकी आज की भिड़भरी स्थितियाँ देखते हुए कितना जरूरी है यह आपके समझ आएगा। आगे भविष्य मे, अभ्यास यह बताता है की दिल्ली की ओर आने वाले यात्रीओं की संख्या हर वर्ष लगभग 5% से बढ़ रही है, ऐसे मे महाराष्ट्र, गुजराथ, राजस्थान और देश के उत्तर पश्चिम राज्यों की ओर से आने वाली गाड़ियों के लिए एक अलगसे टर्मिनल बनाया जाना बेहद जरूरी है।

बिजवासन का नया ट्रेन टर्मिनल, इस जगह पर बनाया जाना इसलिए भी उपयुक्त है, यहाँ से इंदिरा गांधी इंटरनैशनल एयरपोर्ट करीब है और राष्ट्रीय राजमार्ग क्र 8 भी पास ही से गुजरता है जो यात्रीओं को ज्यादा सुविधा प्रदान करेगा। आगे भविष्य मे दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी यहाँ आसपास की जगहों पर ISBT आंतरराज्यीय बस अड्डा, आन्तर्राष्ट्रीय अधिवेशन एवं प्रदर्शनी केंद्र, दिल्ली का दूसरा राजनियीक परिसर और एकीकृत फ्रेट कॉम्प्लेक्स के निर्माण के लिए प्रयत्नशील है।

इस निर्धारित स्थान से इंदिरा गांधी आन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा टर्मिनल 1 – 15 km, टर्मिनल 3 – 13 km, नई दिल्ली रेल्वे स्टेशन 26 km, इंडिया गेट 25 km, CBD 27 km, एम्बियन्स मॉल गुरुग्राम 9 km, एम्बियन्स मॉल वसंतकुंज 15 km, द्वारका सेक्टर मेट्रो स्टेशन 2.8 km, दिल्ली सराय रेल्वे स्टेशन 31 km पड़ता है। इस परिदृश्य मे यह समझ आता है, की यह स्थान ट्रेन टर्मिनल के लिए काफी सुविधाजनक है। ISBT आन्तरराज्यीय बस अड्डा एवं MRTS मास रैपिड ट्रांजिट सिस्टम की उपलब्धता यहाँ पर होनेसे बिजवासन टर्मिनल एक मुख्य बहु यातायात केंद्र बन जायगा।

प्रमुख सुविधाएं :-
1: बिजवासन टर्मिनल पर से 26 डिब्बों की 14 जोड़ी याने 28 गाडियाँ छोड़ी या टर्मिनेट की जा सकेगी।
2: 26 डिब्बों की 44 गाड़ियों के रखरखाव, धुलाई की क्षमता के यार्ड और साइडिंग का निर्माण किया जायगा। किसी गाड़ी की 2000 यात्री क्षमता को देखते हुए 88,000 यात्रीओं की व्यवस्था इस टर्मिनल के निर्माण से होनेवाली है।
3: सेक्टर 21 स्टेशन की मेट्रो लाइन का आगे गुरु ग्राम स्टेशन विस्तार किया जाना है और निर्धारित isbt आंतरराज्यीय बस अड्डे के वजह से यहाँपर यात्रीओं के आवागमन की संख्या मे लक्षणीय वृद्धि होने वाली है।

फ़ोटो और सामग्री IRSDC के सौजन्यसे

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“ती सध्या काय करते”

दरअसल ऐसी एक मराठी मूवी आयी थी, जिसमे फ़िल्म का हीरो इस सवाल के ज़रिए अपनी बचपन की बिछड़ी दोस्त का पता लगाने की कोशिश करते हुए बताया गया है।

लॉकडाउन अवधी का लगभग महीना गुजर गया है और सब के मन मे यही सवाल है “आजकल क्या कर रहे हो?” पहले तो यह सवाल पूछे जाने का अर्थ यह था की, वह अपनी रोजी रोटी के लिए या जीवन मे किसी मंजिल को पाने के लिए कुछ न कुछ तो करता है पर वह जो कुछ कर रहा है आखिर वह है क्या? यह जानने, समझने के लिए या किसी का स्टेट्स नापने के लिए होता था। पर आज कल इस सवाल का छुपा अर्थ यह होता है, भाई, समय कैसे काट रहे हो?

दुनियाभर में इस लॉक डाउन की वजह से करीबन 80% आबादी घरोंमें बैठी है। सोशल डिस्टेनसिंग के लिए यह बेहद जरूरी भी है। केवल जरूरी सेवाएं देने विभाग, इन घरों मे बैठी करोड़ों की आबादी शान्ति और संयम के साथ सुरक्षित जी सके इसलिए अपनी जान हथेली पर रखकर देश की सेवा कर रही है। हम लोग अपने घरों मे सुरक्षित रहे इसलिए यह 20% लोग जिसमे स्वास्थ्य, स्वच्छता, कानून व्यवस्था, बिजली और पानी की व्यवस्था देने वाले विभाग सजग है। हम अपनी और अपनोंकी सुरक्षा के लिए रुके रहे पर हमारा देश न रुके इसलिए हजारों ट्रांसपोर्टर्स जिसमे ट्रक ड्रायवर्स अपनी लॉरियाँ लेकर राशन,अनाज, फल, सब्जियां, दवाएं एक स्थान से दूसरे स्थान पहुंचा रहे है।

रेल्वे भी अपनी मालगाड़ियाँ और पार्सल विशेष गाडियाँ चलाकर इसमे महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। 20 अप्रैल से कई जगहों पर सड़क निर्माण के काम शुरू किए गए है उसके लिए सीमेंट, ताप बिजली घरों के लिए कोयला, लौह कारखानों के लिए खनिज, कच्चा तेल इन हमेशा की ढुलाई के साथ साथ अनाज, दूध, सब्जी की ढुलाई भी रेल्वे अपनी अन्नपूर्णा मालगाड़ियों से कर रहा है। अत्यावश्यक सामान और दवाओं के लिए पार्सल विशेष गाडियाँ चलाई जा रही है। इन गाड़ियों के लिए लोको पायलट, गार्ड्स, स्टेशन मास्टर, परिचालन विभाग के कर्मचारी, रखरखाव कर्मी गाडियाँ चलाने के लिए जरूरी है, अपनी सेवाएं दे रहे है। हालांकि गाड़ियां पटरी पर कम होने से इन लोगों के ड्यूटी साइकल काफी कम है। लोको पायलट और गार्ड्स को 4 – 6 दिन मे एक बार ड्यूटी कॉल आ रही है।

हर कोई जो अत्यावश्यक सेवाओं मे है, अपना काम मुस्तैदी से कर रहा है। जिनके पास इसके बाद भी खाली समय बच रहा है तो कोई जरूरतमंदों की मदत कर रहा है तो कोई राशन, खाना पहुंचा रहा है, और नहीं कुछ तो बैठे बैठे मास्क ही बना रहे है, और जहां लोगों के पास मास्क नहीं है उन्हें ले जा कर दे रहे है। रेल्वे का आईआरसीटीसी खानपान विभाग कई जरुरतमन्द लोगों को पैक खाना और पीने का पानी उपलब्ध करा रहा है।

वह आजकल क्या कर रहे है यह तो आपके समझ मे आ ही गया होगा, आप बताए आप आजकल क्या कर रहे हो?

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यदि चलानी हो रेल, तो लॉक डाउन के बाद प्रशासन हो कठोर।

3 मई को लॉक डाउन – 2 की अवधि खत्म होने जा रही है। ऐसे मे सभी के मन मे यह जानने की उत्कंठा हो रही है, क्या लॉक डाउन आगे जारी रहेगा या इसमे अंशत: छूट का दायरा बढ़ेगा, सबसे बड़ा सवाल, रेल्वे की यात्री सेवाएं शुरू की जाएगी? और यदि हुई तो किस तरह, क्योंकी हर किसी को अब सोशल डिस्टेनसींग का अटूट महत्व समझ मे आ गया है।

कई सारी खबरें, लेख इस विषय पर बन रहे है और रोज नितनई बातें पढ़ने मे आ रही है। रेल्वे प्रशासन ने इस लॉक डाउन की अवधि मे करीबन 20,000 पुराने स्लिपर क्लास के कोचेस जो LHB डिब्बों के चलते रेलवे की साइडिंग पे पड़े थे, उनकी मिडल बर्थ निकालकर, उन्हे आइसोलेशन कोच के लिए तैयार किया है। याने रेग्युलर कैबिन में दो दो अपर, मिडल और लोअर ऐसे 6 बर्थ की जगह अपर और लोअर ऐसी 4 बर्थ की कैबिन बनी है। अब इन संक्रमण की हालातों मे रेल्वे के वातानुकूलित डिब्बे सेंट्रल एयर कंडीशनिंग होने की वजह से यात्रा के लिए उपयुक्त नहीं माने जा रहे। आगामी रेल यात्रा के लिए यही आइसोलेशन वाले कोचेस लगा कर गाडियाँ चलाने की सम्भावनाओं पर चर्चे चल रहे है।

अब फ़ैक्ट समझने की कोशिश करते है। यह पुराने स्लिपर कोच 72 बर्थ क्षमता के होते है। हर कैबिनसे 2 बर्थ हटा दिये जाते है तो हर डिब्बे की 9 कैबिन मे से कुल 18 बर्थ निकाल कर 54 बर्थस रह जायेंगे। हम यह समझकर चलते है, की सोशल डिस्टेनसिंग को आधार रखकर गाड़ियाँ केवल इन्ही स्लिपर डिब्बों के साथ चलायी जाएगी। यह तो हो गई आसन व्यवस्था अब गाड़ियोंकी स्थिति देखते है। दुरांतों, राजधानी, और इन्ही तरह की प्रीमियम गाडियाँ छोड़ दें तो रेल्वे की लगभग 60 से लेकर 70 % गाडियाँ हर 50 किलोमीटर चलने के बाद स्टेशनोंपर रुकती है। उपनगरीय याने लोकल गाडियाँ और सवारी गाड़ियोंकी तो फिलहाल हम बात ही नही कर रहे है।

कई सारे मेल एक्सप्रेस रुकने वाले स्टेशन्स ऐसे है जहाँपर अभी भी पूर्णतया: अनावश्यक प्रवेश के लिए प्रतिबंध नहीं है या यूँ कहिए कोई भी व्यक्ति स्टेशन एरिया मे, प्लेटफॉर्म्स पर बिना किसी बंधन के, रुकावट के आ जा सकता है। गाड़ियाँ अब तक भी स्टेशनों के बाहर सिग्नल के इन्तजार मे खड़ी हो जाती है। ऐसी स्थिति मे गाड़ीमे कोई भी अवांछनीय व्यक्ती प्रवेश कर सकती है या गाडीसे उतर सकती है। गाड़ी मे अभी भी प्रतीक्षासूची के आरक्षण बुकिंग पर कड़े नियम नहीं है। अभी तक PRS याने काउंटर से छपा प्रतीक्षासूची वाला टिकट, यात्री बिना रद्द किए गाड़ी मे यात्रा करते पाया जाता है। क्या सोशल डिस्टेनसिंग की इन स्थितियों मे हम आरक्षण के इन नियमोमे सुधार होता या कोई प्रशासनिक कारवाई होती देख सकते है?

यदि गाडियाँ चलाने का निर्णय लिया जाता है तो सबसे पहले रेल प्रशासन को अपने कुछ नियम और कायदे सुधारने होंगे और उनपर कड़ाई से अमल भी करना होगा। सारे स्टेशन्स या शुरुवात में मुख्य स्टेशन्स केवल परिचयपत्र और उचित अनुमतिपत्र के साथ ही प्रवेश के लिए प्रतिबंधित किए जाए। अनुमतिपत्र पर व्यक्ति स्टेशन के कौनसे एरिया में जाने के लिए पात्र है उसकी जानकारी लिखी जानी चाहिए। जैसे की स्टेशन का आहाता, आरक्षण कार्यालय, टिकटघर, प्लेटफॉर्म्स, गाड़ी का डिब्बा आदि। आगे सबसे महत्वपूर्ण गाड़ी मे आरक्षण किए जाने वाले प्रत्येक यात्री के पास यात्रा करने के उचित कारण हो और किसी भी राजपत्रित अधिकारी का साक्ष्यंकित अनुमतिपत्र हो तभी यात्री को आरक्षण और प्रवेश दिया जाए।

1: रेल प्रशासन को चाहिए की अपनी किसी भी रेग्युलर गाड़ी चलाने के बजाय विशेष गाड़ियों को चलाना होगा। ताकी उनका अलग से टाइम टेबल, अलगसे गाड़ी की संरचना, अलग सुरक्षात्मक दृष्टिकोण रखते हुए मेडिकल जाँच करने वाला स्टाफ और सैनिटेशन किया जा सके ऐसी समुचित व्यवस्था हो इन्ही स्टेशनों पर स्टोपेज दिए जा सके। ऐसी गाड़ियोंके किराए भी अलग दर से याने तत्काल / प्रिमियम तत्काल रेट्स से लिए जा सकते है और यात्री किरायोंमे दी जाने वाली रियायत भी अपनेआप रद्द हो जाएगी।

2: स्टेशन पर गाड़ी मे प्रवेश दिए जाने के लिए हवाई अड्डे पर के सारे मानक अपनाए जाए। गाड़ी मे यात्री चढ़ने के बाद डिब्बे के दरवाजे लॉक होने की सुविधाए हो या मैन्युअली लॉक किए जाए और स्टोपेज आने के उपरांत गाड़ी प्लेटफ़ॉर्म पर पहुंचे तब ही खोले जाए। इसमे भी पूरी गाड़ी यात्री प्रतिबंधित वेस्टिबुल हो याने सभी डिब्बे एक दूसरे से जुड़े हो लेकिन कर्मचारियों के लिए ही एक डिब्बे से दूसरे डिब्बे में जाने की अनुमति हो, केवल एक ही डिब्बे याने गाड़ी के आखिरी डिब्बे से सारे यात्रीओंका का प्रवेश और एक ही, सबसे पहले डिब्बे से निकास हो।

3: गाड़ी के हर डिब्बे मे एक सुरक्षा कर्मी और एक टीटीई जिनके पास गाड़ी के गार्ड और लोको पायलट से सीधी संपर्क व्यवस्था हो। गाड़ी “अलार्म चेन पुलिंग सिस्टम” के बजाय केवल रेल्वे के नुमाइन्दे से निवेदन किए जाने पर ही रोकी जा सके ऐसा नियम बने।

4: गाड़ी में प्रवेश किए जाने वाले यात्री का सामान स्कैन किया गया है ऐसा प्रमाणपत्र आवश्यक किया जाना चाहिए। बिना प्रमाणपत्र के यात्री को गाड़ी में प्रवेश की अनुमति नही रहेगी।

इतने बन्धनोंके उपरान्त ही रेल गाड़ियाँ चलाए जाना ठीक रह सकता है।

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रेलवे की थ्रिलर स्टोरी

(यह सत्य घटना पर आधारित कहानी रेलदुनिया के ब्लॉग पर पूर्वप्रकाशित है। कहानी के पात्रोंके नाम बदले गए है। )

आज भारतीय रेलवे अपनी गती के नए नए कीर्तिमान बनाए जा रही है। सुपरफास्ट, राजधानी, शताब्दी, गतिमान और आज की वन्दे भारत एक्सप्रेस। अब कुछ ही महीनोंकी बात है, ट्रेन 20, जो की 200 km प्रतिघंटा दौड़ने वाली गाड़ी है, आनेवाली है।

क्या आप जानते है, इन सब कीर्तिमान के पीछे कितनी मेहनत, कितनी सजगता है? अफसर, इंजीनियर, टेक्नीशियन बहोत सारे कर्मचारी अपनी दिन रात एक करते है, लेकिन इन सभी की ड्यूटी के साथ साथ एक कर्मचारी और भी है। वो है, भारतीय रेल के इन नए नए कीर्तमान के शिखरोंकी नींव का पत्थर, रेलवे में काम करनेवाला चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी, गैंगमैन,चाबी वाला।

आज की कहानी, इन्ही चाबी वालोंकी है। जिस तरह हर कोई ईमारत देखता है, उसकी मजबूती, बुलंदी देखता है, लेकिन नींव छुपी रह जाती है। उसी तरह यह चाबी वाला शायद ही कभी उजागर होता है।

हमारी कथा का नायक, मुश्ताक़, जिसकी उम्र कोई 37 साल की होगी। रेलवे में गैंगमैन में लग के 12 वर्ष हो गए थे। उसकी गैंग में 70 लोग थे। पटरी की देखभाल करना यह उनके गैंग की ड्यूटी थी। मुश्ताक़ का मुकर्दम बिरजू पांडे था, जो उससे 15 साल सीनियर था और PWI साहब थे लौटू पटेल। दरअसल एक गैंग का मेंबर ही सीनियर बनके मुकर्दम, और आगे जा के लोअर क्लास थ्री में PWI याने परमानैंट वे इंस्पेक्टर बनता है। काम सब का वही, रेलवे ट्रैक का मेंटेनेंस और रिपेयर करना।

मुश्ताक़ हमेशा रात की ट्रैक चेकिंग की ड्यूटी पसंद करता था। रात 10 बजेसे सुबह 6 बजे तक, कंधे पर 20 किलो का थैला, जिसमे पटरी का छोटा टुकड़ा, चाबियाँ, नट, बोल्ट, पाने और लंबे डंडे वाली हतौडी, एक टोर्च, दो सिग्नल वाली बत्तियाँ, दोनों हरी और लाल झंडियाँ, साथमे मोबाईल रेडियो याने वॉकीटोकी। इतना सारा झमेला सम्भालते रात के अँधेरोंमें, कड़कड़ाती ठंड हो या उफनती बरसात, बत्ती के या टोर्च के उजाले में, अकेले ट्रैक को जांचते 5 km जाना और उतना ही वापस आना, अपने मुकर्दम को ट्रैक का रिपोर्ट करना और फिर घर जाना, ऐसी थी ड्यूटी।

यह ऐसीही एक रात की बात है। दिसंबर की ठंड की अंधियारी वाली रात थी। मुश्ताक़ की ड्यूटी श्री क्षेत्र नागझिरी स्टेशन से शुरू होनी थी जो नदी का पुल पार करके पारस स्टेशन तक जाना था। PWI ऑफिस से अपना झोला उठाकर, बिरजू दादा को रामरमाई करके मुश्ताक़ निकला।

स्टेशन खत्म हुवा और आगे पुल शुरू होता है। हमेशा नागझिरी से पारस जाते वक्त, अप लाईन पर चेकिंग की जाती थी और आते वक्त डाउन लाइनपर याने गाड़ी सामने से आए ऐसी दिशा में पैदल चलना। मुश्ताक़ अप लाइन से पुल पार करते जा रहा था, डाउन ट्रैक से एक मालगाड़ी धड़धड़ाते पास हुई। मुश्ताक़ को पुल का थरथराने का आवाज़ थोड़ा अलग ही लगा, उसने सोचा, मालगाड़ी का रेक ज्यादा लम्बा या ओवरलोड होगा। बड़े अफसर पता नही देखते है या नही, वह बुदबुदाया।

थैला उठाकर पारस स्टेशन पहुंचा तो रात के 1 बज चुके थे। दोनोंही तरफ की गाड़ियाँ बराबर चल रही थी। उसने पारस के मास्टर से अपने डायरी में साइन करवाई और वापसी ड्यूटी के लिए निकल पड़ा। स्टेशन मास्टर ने उसे आवाज दी, “अरे मुश्ताक़, चाय तो पिता जा।” “ओ नही साबजी, जर्दा दबा लिया है।वैसे भी आज कुछ ठीक नही लग रहा। पता नही ये चौदस, अमावस मुझे भारी क्यो लगती है?” मुश्ताक़ ने बाहर मुँह निकाल, एक पीक मारी और पटरी पर बढ़ गया।

जाती आती गाड़ियोंको बत्ती दिखाए आगे बढ़ रहा था, बस नदी आ गई है, पुल पार किया की ड्यूटी पूरी। अब वह डाउन पटरी से आ रहा था। पिछेसे पारस से छूटी सेवाग्राम एक्सप्रेस साँय साँय करते उसे पास कर गई। उसके मंझे हुए कानोंमें एक खट खट की डरावनी आवाज़ आई। गाड़ी तो निकल चुकी थी। नागझिरी से पारस जाते हुए उसने अप साइड की पटरी चेक करी थी। उसका दिल बड़े जोर जोर से धड़कने लगा।

अपना डाउन ट्रैक छोड़कर वह फिरसे आवाज की तलाश में अप ट्रैक पर आया। देखता तो क्या? सन्न रह गया। धुजनी छूट गई, इतनी गहरी ठंठ में वह पसीने पसीने हो गया। पुल जहाँ ख़त्म हो रहा था, वहाँ की दोनों ही पटरी बिल्कुल छूट गई थी। ये तो सीधे सीधे पुल का गर्डर खिसकने की निशानी थी। वह सीधे पलटा, और पुल के दूसरे छोर की तरफ याने पारस स्टेशन की ओर दौड़ने लगा। जैसे ही पुल खत्म हुआ, उसके 50 मीटर आगे जाके उसने झोले से बत्ती निकली और उसमें लाल कांच चढाकर अपने हटौडे के डंडे पे टांग दी। दूसरा काम, फौरन वॉकीटोकी निकाल अपने मुकर्दम से बात शुरू की।

वॉकीटोकी याने मोबाईल रेडियो की व्यवस्था ऐसी रहती है की, 5 km के दायरे में सभी एक्टिव मोबाइल रेडियो एक दूसरे से सम्पर्क कर सकते है। मुश्ताक़ ने वॉकीटोकी को शुरू करते ही, उसकी रेंज में जितने भी मोबाईल रेडियो है, जो सब उसकी आवाज सुन रहे थे, और वो बदहवास सा चिल्ला रहा था। “ओ बिरजू दादा, पारस के मास्टर साब, नागझिरी के मास्टर साब, नदी के पुल पर, अप लाईन की दोनों पटरी चटख गई है, शायद पुल का गर्डर खिसक गया है। गाड़ियाँ रोक दीजिए। मैं ऑन ड्यूटी चाबी वाला मुश्ताक़ बोल रहा हूँ।

” अबे, क्या बक रहा है? ” वॉकीटोकी पर बिरजू चीखा, उधर पारस और नागझिरी के मास्टर की भी हालत खराब हो गई, अफ़रातफ़री मच गई। ईधर बिरजू पांडे जानता था, की मुश्ताक़ घबराहट में तो है, लेकिन ऊलजुलूल नहीं बकेगा, उसने फौरन अपने PWI लौटू पटेल को फोन लगाया, और मुश्ताक़ की बात बता दी।

बात की अहमियत जानते, लौटू पटेल, जो भुसावल में था, फौरन ही कंट्रोल ऑफिस पहुंचा। कंट्रोल ऑफिस ने तुरन्त इमरजेंसी सायरन बजवा दिए।

इधर मुकर्दम बिरजू ने भी अपना थैला उठाया और वह भी नदी की तरफ दौड़ पड़ा। नागझिरी और पारस स्टेशनोंपर इमरजेंसी लग चुकी थी। दोनोंही स्टेशन का PWI गैंग नदी की तरफ रवाना हुवा। भुसावल कंट्रोल पूरे हरकत में गया। सायरन सुनकर अफसरों के फोन शुरू हो गए। ब्रेक वैन को 15 मिनिट का वक्त दिया गया। इमरजेंसी गैंग अपने औजारों के साथ स्टेशनपर जमा होने लगी। नागपुर भुसावल ट्रैक का पूरा ट्रैफिक फौरन रोक दिया गया। जो जहाँ है उसे वहीं रोका जा रहा था।

बिरजू के साथ की गैंग, उधर पारस की गैंग पुल पर मुश्ताक़ के पास पहुंची। मुश्ताक़ अभी तक थरथरा रहा था। जब सब लोग पुल के छोर पर पहुंचे तो पटरी की हालत देखकर सन्न रह गए। दोनों पटरी टूटकर कमसे कम 4 इंच नीचे सरक गई थी। जब गर्डर की तरफ नज़र गई तो गर्डर एक छोर से लटक गया था। हालात देख सबकी रूह काँप गयी की अभी अभी सेवाग्राम एक्सप्रेस उसी पटरी से 100 की स्पीड से गई थी।

लगभग 70 मिनट में, भुसावल से ब्रेक डाउन गाड़ी नागझिरी पुल के जगह पहुंची और सभी जिम्मेदार अफसरों और टेक्नीशियन्स ने मोर्चा संभाला।

आगे उस पुल की मरम्मत का काम 2 महीने चला, लगभग 1 हफ्ते तक, उस सेक्शन की ट्रैफिक पूर्णतया बन्द थी, जिसे 1 हफ्ते बाद स्पीड रिसट्रिक्शन याने धीमे गति की पाबंदी के साथ शुरू की गई।हमारे अननोन, अज्ञात, बिना प्रसिद्धि मिलने वाले हीरो को, मुश्ताक़ को मुम्बई के जनरल मैनेजर से अवॉर्ड घोषित किया गया।