लॉक डाउन में अलग अलग छूट दी गयी, तो शराब के ठेकोंपर मेले लग गए, श्रमिकोंके लिए विशेष गाड़ियोंका आयोजन क्या किया गया, वहाँ और अलग खेल हो रहे। जगह जगह पर अटके श्रमिक भाईयोंको अपने घरों को जाने की अदम्य इच्छा को गृह मन्त्रालय ने रेल प्रशासन को साथ लेकर मूर्त स्वरूप दिया।
जो स्टेशन कई दिनोंसे खुले नही थे, रेलवे संक्रमण के चलते, अपने कई कर्मचारियोंको घर बैठे तनख्वाह दे रही थी, ऐसी स्थिति में, इन श्रमिकोंको घर पहुंचाने के लिए रेलवे का पूरा महक़मा काम पे लग गया, रेलवे के अफसर राज्य सरकारोंसे सम्पर्क कर रहे है, तो सुरक्षा कर्मी अपनी जान जोख़िम में डाल इन लोगोंकी सुरक्षा के लिए तैनात है, गाड़ियोंमे भी इनके साथ जा रहे। खाने के लिए व्यवस्थाएं की जा रही है। पानी की बोतलें दी जा रही है।
लेकिन निम्नलिखित व्हिडियो में देखिए, क्या यही अनुशासन है? क्या इस तरह का व्यवहार शोभा देता है? एक तरफ इन श्रमिकोंसे किराया न लेने पर अलग अलग चर्चाएं हो रही है और दुसरी तरफ मुफ्त में परोसा गया खाना, पानी की बोतलें यह लोग प्लेटफार्म पर फेंक रहे है। रेल्वेके स्टाफ़ को गालियां देते है। बताइए लॉक डाउन हटने के बाद भी क्या रेलवे सुचारू रूप से चलाई जा सकेगी?
कोई कार्य सेवा भाव से किया जाता है, पर उसका सिला इस तरह मिलेगा तो मन खट्टा हो जाता है। यह ठीक उसी तरह की प्रताड़ना है, जिस तरह करोंना वॉरियर्स, डॉक्टरों को पीटा जा रहा है। यहाँ गालियाँ है, खाना, पानी फेंकना है।
