17 दिसम्बर 2023, रविवार, मार्गशीर्ष, शुक्ल पक्ष, पंचमी, विक्रम संवत 2080
आजकल सोशल मीडिया में रेल विषयक एक अलग ही दुष्प्रचार(?)चल रहा है। कोई घर बैठा व्यक्ति, फलाँ रेल मार्ग, फलाँ रेलवे स्टेशन या अमुक कोई रेल गाड़ी आम यात्रिओंके लिए कितनी दुःखदायी हो गयी है, इसका दुखड़ा छेड़ता है और उसके सुर में सुर मिलाए कई और उसके समर्थक खड़े हो जाते है।
ऐसे नही है, की रेल विभाग के निर्णय आम यात्रिओंको तकलीफ़देह नही है। लम्बी दूरी की नियमित मेल/एक्सप्रेस गाड़ियोंसे ग़ैरवातानुकूलित कोचों की संख्या कम होना यह सामान्य यात्रिओंके लिए बहुत बड़ा झटका है। रेल किरायोंमे मिलनेवाली वरिष्ठ नागरिकों की रियायत का बन्द हो जाना, सवारी गाड़ियोंका अचानक रेल नेटवर्क से हटाया जाना, यह बातें आम यात्रिओंके लिए अकल्पनीय है। और तो और उन गाड़ियोंकी भरपाई करने वाली गाड़ियोंको केवल आठ कोच की मेल/एक्सप्रेस मेमू में बदलना ज्यादा विस्मयकारी है। रेल विभाग के ऐसे निर्णयोंपर आम यात्री बस भौंचक बन रह गया है। खुद को प्रताड़ित, दबा-दबा सा महसूस करता है। उसकी यह पीड़, जब सोशल मीडिया के माध्यमसे कोई सामने ले आता है, तो उसे बड़ा समर्थन मिलता है। लगता है, वाकई आम रेल यात्रिओं पर बड़ा अत्याचार हो रहा है।
एक तरफ़ आम नागरिक यह भी समझता है, रेल किराए और सड़क यातायात के किराए के अन्तर देखे जाए तो आज भी (सवारी गाड़ियाँ बन्द होने के बावजूद) रेल किराए किफायती है। लम्बी दूरी के यात्रिओंका ग़ैरवातानुकूलित कोच की जगहोंपर वातानुकूल कोचोंमे यात्रा करने का चाव दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। यह सीधे ‘डिमाण्ड एण्ड सप्लाय’ फॉर्मूले के आधार पर रेल विभाग इन कोचोंको बढ़ा रहा है, जिसकी परेशानी 500 किलोमीटर से कम अन्तर के यात्रा करनेवाले आम यात्रिओंको हो रही है। 4-6 घण्टे की रेल यात्रा के लिए यात्री को शायिका की आवश्यकता नही रहती और उसमे भी वातानुकूल शायिका की तो बिल्कुल ही नही रहती। एक वक्त था, साधारण टिकट से अमूमन दुगना किराया देकर आम आदमी अपनी टिकट ग़ैरवातानुकूलित, स्लिपर कोच में आरक्षित करवा लेता था। चूँकि यह कोचेस नियमित मेल/एक्सप्रेस में घट गये है, उसे वह टिकट मजबूरन वातानुकूल कोच में बुक करना पड़ता है। साधारण मध्यम वर्ग की यह परेशानी है, अत्याधिक भीड़ के वजह से अनारक्षित साधारण कोच में वह यात्रा करना नही चाहता या कर नही पाता और वातानुकूल कोच के किराए उसका बजट बिगाड़ देते है।
ऐसी मन को कचोटने वाली पीड़ाएँ, “जो कही भी नही जाती और सही भी नही जाती” जब सोशल मीडिया के माध्यम से कोई ले आता है, तो सर्वसामान्य व्यक्ति उस भावनाओं बहता चला जाता है, भले ही वह बातें उसे लागू नही होती हो। उसे लगता है, बस यही बात है, की उसे लुटा जा रहा है, प्रताड़ित किया जा रहा है। उसकी कोई सुनवाई नही हो रही, अनदेखी हो रही है। खुद को वह बड़ा असमर्थ महसूस करता है। दरअसल यह एक जनमानस को उकसाने, एक विचार तैयार करने की, उदासीन या विद्रोही मानसिकता घड़ने की प्रक्रिया है।
मित्रों, इन सब अनावश्यक तनावों से बचने की जरूरत है। सर्वप्रथम आप अपनी प्राथमिकता पर ध्यान लगाए। आपके लिए कुछ प्रश्न है, जिसके उत्तर जब आप खोज लेंगे आपका समाधान हो जाएगा की आप सोशल मीडिया से व्यर्थ ही ‘अनावश्यक स्ट्रेस, तनाव’ मोल ले रहे है।
आप किस प्रकार के रेल यात्री है? रोज जाना-आना या सप्ताहांत या महीने दो-चार महीने में एखादबार या फिर वर्ष के एखादबार? रोजाना के यात्री में भी विद्यार्थी है, नौकरीपेशा है या कारोबारी?
पर्यटक है तो अमूमन लम्बी दूरी की कितनी रेल यात्राएं करते है और कम दूरी की कितनी रेल यात्रा करते है? रेल यात्रा का चयन खुद करते है या किसी ओर से जानकार से सलाह कर टिकट बनवाते है।
लम्बी दूरी की गाड़ियोंके स्टोपेजेस कम होने या बढ़ने से आपके रेल यात्रा पर उस क्या असर होगा?
वन्देभारत या उस प्रकार की प्रीमियम गाड़ियोंके चलने से आपकी रेल यात्रा से कितना वास्ता है? आपको प्रीमियम गाड़ियोंका कितना उपयोग होना है?
आपकी रेल यात्रा किस प्रकार के किराए से होती है, साधारण जनरल टिकट, मासिक पास (सीजन टिकट MST), या आरक्षित टिकट?
आम तौर पर रेल यात्रा के अलावा, रेलवे स्टेशन पर जाने का काम कितनी बार पड़ता है? क्या आप रेल आहाते में प्रवेश करने से पूर्व उचित टिकट ले कर आगे बढ़ते हो?
यह साधारण से प्रश्नोंके उत्तर आपने पा लिए तो बहुतसे सोशल मीडिया के पोस्ट, फॉर्वर्डस आपको परेशान नही करेंगे। बहुत सी बार कोई प्रीमियम गाड़ी आपके शहर, स्टेशनसे बिना स्टोपेजेस, सीधी जाती है उसकी भी कई लोगोंको व्यर्थ ही परेशानी होती है, भले ही उनका उस गाड़ी में कभी भी यात्रा करने का औचित्य न हो। शुरू हो जाएंगे स्टोपेजेस की माँग लेकर! वन्देभारत प्रकार की प्रीमियम गाड़ी की माँग को लेकर सोशल मीडिया पर कैंपेन छेड़ देते है, यह तक नही सोचते की स्थानीय आवश्यकता क्या है, उपयोगिता कितनी रहेगी? कुल मिलाकर यह है, “पराया दुख दुबला!” वैसे दुबला, वुबला तो क्या होगा, खुद की सोशल मीडिया पर जनमतसंग्रह बढाने हेतु आम लोगोंकी भावनाओं को छेड़ना होता है। 😊
