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बदल जाएंगे, बंगलुरू के टर्मिनस स्टेशन

बंगलुरू के लिए रेल्वे की खबर है।

बैयापनहल्ली टर्मिनस, बंगलुरू का चौथा नया टर्मिनल स्टेशन जल्दही कार्यान्वित होने जा रहा है। दक्षिण पश्चिम रेलवे के अनुरोधपर रेलवे मुख्यालय ने जारी किए परिपत्रक के अनुसार कई गाड़ियाँ अब बंगलुरू, यशवंतपुर, बंगलुरू कैंट स्टेशन टर्मिनेट न होते हुए बैय्यापनहल्ली को टर्मिनेट की जाएगी।

हालाँकि अभी समय सारिणी और यह सब कबसे लागू होना है यह अभी तय नहीं है। यह क्षेत्रीय रेलवे तय करेगी।

देखिए परिपत्रक,

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आखिर कब तक?

क्या कर सकती है रेल प्रशासन, जब कोई ट्रेन में दम घूँटके मर जाये?

90 आसनोंकी क्षमताके द्वितीय श्रेणी डिब्बेमे 200 लोग घुस जाते है, 72 लोगोंकी क्षमता के स्लिपर डिब्बेमे 8 RAC तो अधिकृत रूपसे ज्यादा यात्रा कर रहे होते है तो क्या फर्क पड़ जाएगा सौ, सवासौ लोग और वेटिंग लिस्ट वाले भी स्लिपर क्लास में चढ़ जाए?

रेलवे जिसे आरक्षित डिब्बे कहती है, वह स्लिपर क्लास, वातानुकूलित शयनयान डब्बोंमे सुबह तड़के 4 बजेसे “चाय चाय” करते बेचने वाले घुस जाते है, दिनभर भेल, समोसे वाले इत्मिनानसे अपना धंदा करते है, भगवान के नाम पर मांगने वाले, हक जताकर दस दस रुपए लेकर दुवाएं बेचनेवाले तृतीयपंथी जब बिना किसी रोकटोक के अपना गुजरबसर करने रेल को अपनी बापौती समझ सकते है तो दो चार आठ दस बिना टिकट लोग यात्रा कर ले तो कौनसी बडी बात हो जाएगी? यह तो चलती गाड़ी की बात है, प्लेटफॉर्मोपे भी यात्री ज्यादा मूल्य देकर खाद्यसामग्री खरीदता है। और यह सब रेल्वे प्लेटफार्म पर पचास पचास सीसीटीवी कैमरे लगे होने के बावजूद चलते रहता है। तो आप रेल प्रशासन से उम्मीद क्या क्या कर लोगे?

आखिर क्या कर सकता है रेल प्रशासन, जब बेचनेवाला बेच रहा है और खरीदने वाला खरीद रहा है। अपने अपने पैसे है, जैसे मर्जी चाहे खर्च करें। है ना?

लेकिन एक बात है, चाहे जितनी अनदेखी हो, कायदेकानुन के पालन की कोताही हो, पर रेल के डिब्बे में यात्रीका घुट कर मर जाना ये तो हद ही हो गयी। क्या कोई मरने के लिए भी रेल में आता है भला? सच मे, बताइए, क्या कर लेगा प्रशासन?

वह कौनसा दिन होगा, जब प्रशासन अपनी आंखें खोलेगा? कब बन्द होंगे गैरकानूनी बिक्रेता, कब बन्द होंगे गैरकानूनी रूपसे रेलोंमें झाड़ू लगानेवाले अनाधिकृत सफाईवाले, खुद बिना टिकट चलनवाले और पैसे लेकर टिकटधारी यात्रिओंको दुवाएं देनेवाले? कब दिखेगा यह सब रेल प्रशासन की आँखोंको? जो लगे हुए है सीसीटीवी, उनसे तो नही हो पा रहा यह काम। तो बताइए कौनसा कैमेरा लगवाए, जिनसे यह आम दिखाई देते दृश्य रेल प्रशासन को भी दिख जाए।

दम घुटने वाली ख़बर, पटना से दिल्ली की ओर जा रही ट्रेन की थी। एक युवती भीड़ के चलते दम घूँटकर मर गयी और कल और ख़बर आ गयी की केरल एक्सप्रेस में गर्मी के चलते 4 बुजुर्गों की जान चली गयी। वे लोग आगरा से कोयम्बटूर जा रहे थे और ट्रेन के स्लिपर डिब्बे में दोपहर तीन बजे आगरा से चढ़े थे।

किसका दोष था, क्या गलती हुई? हम तो इन घटनाओं से बहोत आहत है। अब इसके लिए जाँच होगी, समीक्षा होगी, रिपोर्टें आएगी और फिर कोई निष्कर्ष निकलेगा। लेकिन रेल प्रशासन, अपने आप को कब चाकचौबंद करेगा? आखिर कब?

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LHB कोच की ABCD

आजकल पूरे भारतीय रेलवे में LHB कोच का बोलबाला है। कोई भी गाड़ी को नए LHB रेक मिलते है तो बड़ी हर्षोल्हास की लहर छा जाती है और अख़बरोंकी हेडलाईन बन जाती है। क्या होता है यह LHB कोच और क्या फर्क ले आता है गाड़ियोंमे? आइए समझते है।

LHB यह एक जर्मनी की रेल डिब्बे बनानेवाली कम्पनी लिंक हॉफमैन बुश का शार्ट नेम है। भारतीय रेल को हाई स्पीड ट्रेनोकी जरूरत महसूस होने लगी थी और हमेशा वाले ICF कोच की गति 110 – 120 से ज्यादा नही थी। तलाश की गई और 1995 में तकनीकी हस्तांतरण के तहत जर्मनी के LHB कम्पनीसे 24 वातानुकूलित चेयर कार का पूरा रेक याने एक पूर्ण गाड़ी की रचना भारत में RCF रेल कोच फैक्ट्री कपूरथला लाया गया और उसे नई दिल्ली लखनऊ शताब्दी एक्सप्रेस में प्रयोग के तौर पर लगाया गया। अलग थलग रंग, बड़े बड़े शीशे की खिड़कियों से सज्जित यह गाड़ी थी तो बहोत अच्छी लेकिन शुरू में मार्ग के लोगोंने इसके शीशे पर पत्थर मार मार कर गाड़ी को फिर से RCF के शेड के भीतर पोहचा दिया।
फिरसे शीशोंपर सुरक्षा टेप लगाए गए, कुछ और थोड़े बहुत बदल कर कराके यह गाड़ी पटरी पर लाई गई।
वैसे टेक्निकल कोलेब्रेशन वर्ष 2000 में शुरू हुवा।

आइए सबसे पहले हम LHB डब्बोंकी तकनीकी बाते समझते है,
LHB डिब्बे की लंबाई 23.54 मीटर और चौड़ाई 3.24 मीटर होती है। लम्बाई पुराने ICF डिब्बोंसे 1.7 मीटर ज्यादा होनेसे LHB डिब्बे की यात्री क्षमता 10% बढ़ जाती है।

LHB कोच में CBC याने सेंटर बफर कपलिंग का उपयोग होता है, इस वजहसे ट्रेन दुर्घटना में यह डिब्बे अपने सामनेवाले डिब्बे पर चढ़ते नही और नाही दबके जमा होते है।

LHB कोच, स्टेनलेस स्टील और एल्युमिनियम धातु से बनाए जाते है। इस वजह से LHB डिब्बोंका टेयर वेट, याने खुदका वजन 39.5 टन होता है जो पुराने डिब्बोंसे कम है। जिससे गाड़ी की गति क्षमता 160 – 200 KMPH मिलती है।

हर डिब्बेको APDBS एडव्हान्स प्यूमेटिक डिस्क ब्रेकिंग सिस्टम लगा होता है जिससे गाड़ी को तुरन्त नियंत्रण में लाया जा सकता है।

LHB डिब्बों की अत्याधुनिक तकनीक की वजह से गाड़ी चलते वक्त, गाड़ी का आवाज केवल 60 डेसिबल है जबकी पुराने ICF कोचमे यही आवाज 100 डेसिबल है।

आंतरराष्ट्रीय मानकोंमें डिब्बोंके राइड इंडेक्स जांचे जाते है। जितना राइड इंडेक्स कम उतना डिब्बा यात्राके लिए आरामदायी ऐसे माना जाता है। LHB डिब्बे का राइड इंडेक्स 2.5 – 2.75 है तो ICF कोच का 3.25 होता है।

ICF कोच बनाने की लागत से कम कीमत में यह LHB कोच बन जाते है।

LHB डब्बोंमे अत्याधुनिक बायो टॉयलेट होते है, जिससे रेलमार्ग साफसुथरा रहने में मदत मिलती है।

LHB डिब्बोंका POH याने पीरियोडिक ओवरहॉल, रखरखाव की अवधी 24 माह की है जो की ICF कोच में 18 माह की होती है। जिससे LHB डिब्बे ज्यादा वक्त तक ईस्तेमाल के लिए उपलब्ध रहते है।

LHB कोच में एखाद, दो तकलीफें भी है।
CBC सेंटर बफर कपलर होने की वजह से गाड़ी जब शुरू होती है या ब्रेक लगाए जाते है तब डब्बोंको एक झटका, जर्क लगता है और दूसरा यह की डिब्बे में पुराने ICF डिब्बोकी तरह सेल्फ जनरेटिंग सिस्टम नही होने से रेक के दोनों एन्ड पर जनरेटर डिब्बा लगाना पड़ता है। हालाँकी नई, सुधारित HOG हेड ऑन जनेरेशन तकनीक से इंजिन से ही डब्बोंको इलेक्ट्रिक सप्लाई की जाने लगी है।

भारतीय रेल की 5 कोच फैक्ट्री है, जिसमे सर्वप्रथम वर्ष 2003 से RCF कपूरथला पंजाब में LHB कोच का उत्पादन शुरू किया गया। भारतीय रेल की सबसे पुरानी कोच फैक्ट्री, ICF पेरामबुर तमिलनाडु में वर्ष 2013 से इसका उत्पादन शुरू हुवा जो 2018 से पूर्ण क्षमतासे चलाया जा रहा है। MCF रायबरेली उत्तर प्रदेश में वर्ष 2017 से LHB का उत्पादन शुरू हो चुका है और RCF पालक्कड़ केरल, RCF कोलार कर्नाटक में भी शुरू होने जा रहा है।

आनेवाले दिनोंमें भारतीय रेल पर सभी गाड़ियाँ LHB कोचेस द्वारा चलाई जाने लगेंगी और आप सभी को LHB कोच की पूरी ABCD पहलेसेही पता रहेगी। तो आनंद लीजिए LHB कोच के आरामदायी सफर का।

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यात्रीगण कृपया ध्यान दे,

पश्चिम मध्य रेलवे के कटनी स्टेशन पर 5 जोड़ी गाड़ियाँ आने वाली 1 जुलाई से नही रुकेगी।

आगे समाचार यह है की, दिनांक 1 जुलाईसे 22911/22912 इंदौर हावड़ा क्षिप्रा एक्सप्रेस, 11071/11072 रिवा हबीबगंज एक्सप्रेस, 11703/11704 रिवा अंबेडकर नगर महू एक्सप्रेस, 11071/11072 लोकमान्य तिलक टर्मिनस वाराणसी कामायनी एक्सप्रेस और 19421/19422 पटना अहमदाबाद एक्सप्रेस यह पाँच जोड़ी गाड़ियाँ कटनी स्टेशन के बजाय कटनी मुड़वारा में रुकेगी।

प म रेल्वे ने यह फैसला कटनी स्टेशन पर गाड़ियोंकी ज्यादा संख्या होने की वजह से गाड़ियोंके समय पालन ने असुविधा हो रही थी, उसके सुधार हेतु लिया है।

भोपाल, बीना मार्ग से कटनी की ओर आनेवाली गाड़ियोंके लिए कटनी की जगह कटनी मुरवाड़ा स्टेशन से परिचालन होगा। यह सभी गाड़ियाँ कटनी मुरवाड़ा में 10 मिनट रुकेगी।

कटनी से कटनी मुरवाड़ा स्टेशन का गुगल मैप –