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यात्रियों के लिए रेलवे उपभोक्ता सलाहकार समिति का कार्य

21 अगस्त 2026, शुक्रवार, श्रावण, शुक्ल पक्ष, नवमी, विक्रम संवत 2083

रेलवे द्वारा यात्रियों के हितों को बढ़ावा देने के लिए, उनकी मांगों को रेलवे के सीनियर अधिकारियों के सामने सीधे “आमने-सामने” पेश किया जाए, और उनकी मांगों पर चर्चा हो, इसके लिए प्लेटफॉर्म से लेकर रेलवे बोर्ड तक ‘कंज्यूमर एडवाइजरी कमेटियां’ बनाई जाती हैं।

इनके समितीयोंके स्तर प्लेटफॉर्म कमेटी, स्टेशन कमेटी, मण्डल कमेटी, क्षेत्रीय कमेटी और राष्ट्रीय कमेटी इस प्रकार से हैं। इसमें अलग-अलग रजिस्टर्ड पैसेंजर एसोसिएशन के सदस्य, ट्रेड एसोसिएशन के सदस्य, कंज्यूमर एसोसिएशन और ज़्यादातर सत्ताधारी राजनीतिक संगठनों के MP और MLA के प्रतिनिधि, उनकी सलाह से नियुक्त किए जाते हैं। लगभग हर कमेटी का कार्यकाल दो वर्ष का होता है। उसके बाद फिर से नए सदस्य चुने जाते हैं।

अब यह कमेटी जिस भी लेवल पर बनती है, उस स्तर की मांगों को कमेटी की मीटिंग में हिस्सा लेने वाले सदस्यों द्वारा पेश किया जाता है, चर्चा की जाती है और सही मांगों को आगे के फैसले के लिए ऊपर के लेवल पर भेजा जाता है।

इसके अलावा, आजकल रेलवे के डिविजनल/रीजनल मैनेजर, DRM या GM रेलवे के रीजनल या डिविजनल अधिकार क्षेत्र में आने वाले लोकसभा क्षेत्रों के मौजूदा सांसदों (MPs) के साथ मीटिंग करते हैं। इन मीटिंग में सांसद अपने इलाके में रेलवे से जुड़ी मांगें और समस्याएं रखते हैं। यह तरीका कंज्यूमर कंसल्टेटिव कमेटी जैसा ही है, यानी लोकल अधिकारी जिन मांगों को सही और मुमकिन मानते हैं, उन्हें ऊपर मुख्यालय भेजा जाता है। ज़्यादातर मांगें स्टॉपेज और नई ट्रेनों की मांग, तक सीमित रहती हैं। स्थानीय यात्री क्या चाहते हैं, उनकी क्या समस्याएं है, इसकी कोई विशेष स्टडी, प्रतिनिधियों के पास नहीं होती। असल में, कंसल्टेटिव कमेटी के कुछ ही सदस्यों का रेलवे रिलेटेड अभ्यास, परिपूर्ण रहता है, इसलिए बुनियादी समस्याएं हमेशा नज़रअंदाज़ ही रह जाती हैं और मीटिंग में बहुत सारी मांगें पेश होने के बाद कोरे वादों के ठंडे बस्ते में डाल दी जाती हैं।

कल पुणे में हुई हंगामेदार मीटिंग की खबर चर्चा में आने के बाद यह लेख की कल्पना आई। पुणे के लोकप्रतिनिधियों ने अपने-अपने क्षेत्र की मज़बूत मांगें रखी हैं। दो-तीन वंदे भारत, पंढरपुर, कोल्हापुर तीर्थयात्रा ट्रेनों, स्टेशन की साफसफाई, भीड़ का नियोजन और पैसेंजर सेफ्टी से जुड़ी मांगें रखी गईं। नई ट्रेनों, स्टॉपेज की मांगें हमेशा पॉपुलर टॉपिक होते हैं और इस पर पैसेंजर्स में आम सहमति भी होती है, लेकिन इन मांगों पर फैसला और उन्हें लागू करने का काम सिर्फ रेलवे हेडक्वार्टर, यानी रेलवे बोर्ड ही करता है, इसलिए ये मांगें सिर्फ दिखावा बनकर रह जाती हैं। स्टॉपेज के लिए रेलवे का अलग कैलकुलेशन है। फुटफॉल और स्टेशन की कमाई चेक की जाती है, इसकी तुलना स्टॉपेज के खर्च से की जाती है। अगर सही कैलकुलेशन हो जाए, तो छह महीने का एक्सपेरिमेंटल स्टॉपेज दिया जाता है और इसे समय के साथ रेगुलर किया जा सकता है। नई ट्रेनों की मांग वाले स्टेशन और रूट की कैपेसिटी चेक की जाती है। बेशक, ये सब मना करने के बहाने हो सकते हैं क्योंकि जब ट्रेन शुरू करने के लिए सीनियर लेवल पर फैसले हो जाते हैं, तो ये सारी रुकावटें वैसे भी खत्म हो जाती हैं।

पुणे से मुंबई के लिए रोज़ अप/डाउन की पॉपुलर ट्रेन, डेक्कन क्वीन को प्लेटफॉर्म नंबर 1 से चलाने की मांग की जा रही है। ठीक है, कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन पैसेंजर्स की बेसिक मांग यह है कि डेक्कन क्वीन, प्रगति, इंद्रायणी, इंटरसिटी जैसी ट्रेनों को कोच संख्या बढाकर 22/24 कोच का बनाया जाए, वहाँ प्रतिनिधियों की सिर्फ़ प्लेटफॉर्म बदलने की मांग से स्थानीय यात्रिओंमें निराशा है।

वाराणसी की गाड़ी हडपसर से ही सही मगर रोज़ चलने लगी। पुणे से गोरखपुर और पटना के लिए रोज़ ट्रेनें हैं, लेकिन नागपुर और चंद्रपुर के लिए सीधे एक भी दैनिक ट्रेन नहीं है। तीन-तीन दिन गरीबरथ, सुपरफास्ट और छह दिन की वंदेभारत चल रही हैं। हावड़ा, बिलासपुर और गोंदिया चलने वाली ट्रेनों में आम पैसेंजर्स के लिए जगह नहीं मिलती।

सबसे ज़रूरी बात, पुणे स्टेशन का विस्तार करने की बहुत ज़रूरत है, जो अब शुरू हो चुका है। प्लेटफॉर्म की संख्या 6 से बढ़कर 10 से 12 हो जाएगी। इसलिए, प्लेटफॉर्म बढ़ने के बाद कुछ नई ट्रेनों की मांग पूरी हो सकती है। खड़की, हडपसर नए सैटेलाइट टर्मिनल बन गए हैं। पुणे लगभग मुंबई जैसा घने सबर्ब्स वाला महानगर बन चुका है। पुणे-लोनावला के बीच मुंबई की दिशामे सबअर्बन ट्रेनें चलती हैं। उन्हें विपरीत दिशा में, दौंड-अहिल्यानगर तक बढ़ाया जाना चाहिए। अहिल्यानगर एक बड़ा जंक्शन बनने वाला है। नया अहिल्यानगर-बीड रूट, प्रस्तावित शिरडी, छत्रपति संभाजीनगर और अलग पुणे रूट पर विचार किया जा रहा है।

अभी, पुणे स्टेशन पर खत्म होने वाली सभी लंबी दूरी की ट्रेनों को पुणे स्टेशन से होकर जाने वाले किसी भी दो प्लेटफॉर्म से, पुणे स्टेशन पर 5 मिनट का स्टोपेज देकर, अगले सैटेलाइट टर्मिनल पर खत्म किया जाना चाहिए, ताकि पुणे स्टेशन पर भीड़ का सही नियोजन कीया जा सके। मुंबई से आने वाली ट्रेनें हड़पसर, दौंड में खत्म होनी चाहिए, और सोलापुर, मनमाड़ की ओर से आने वाली ट्रेनें खड़की, चिंचवड़, लोनावला पर खत्म होनी चाहिए। पुणे के वॉशिंग साइडिंग, पिट लाइन, कोच मेंटेनेंस को भी कहीं और शिफ्ट किया जाना चाहिए ताकि पुणे स्टेशन को ठीक से विकसित किया जा सके।

पुणे के लोकप्रतिनिधि जानकार हैं। उनकी मांगें और उन्हें पूरा करने की उनकी क्षमता भी है। चूँकि ऐसे मामलों में विषय के पीछे लगे रहना, तमाम मदोंकी जैसे की जनमत, पुर्तता करना आवश्यक रहता है। इसलिए हम पुणेकरों को उन पर पूरा भरोसा करना चाहिए और उनकी मांगों का सपोर्ट करना चाहिए।

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