भुसावल से इटारसी, इटारसी से कटनी और प्रयागराज से सतना विद्युतीकरण पूरा हो गया था केवल बीच का कटनी से सतना मार्ग का विद्युतीकरण बाकी था। हालाँकि इलेक्ट्रिक लोको से गाड़ियाँ चलाई जा रही थी। कटनी में एक डीजल लोको और लगाकर गाड़ी सतना तक जाती थी, वहाँ पर डीज़ल लोको निकल जाता था और गाड़ी इलेक्ट्रिक लोको से आगे बढ़ जाती थी। इस लॉकडौन के काल मे रेल प्रशासन ने वह बचा हुआ विद्युतीकरण का काम भी पूरा कर लिया है। इससे प्रयागराज की ओर जाने वाली सारी गाड़ियाँ शंटिंग के लिए बिना रुके सीधी चलेगी।
लॉक डाउन में अलग अलग छूट दी गयी, तो शराब के ठेकोंपर मेले लग गए, श्रमिकोंके लिए विशेष गाड़ियोंका आयोजन क्या किया गया, वहाँ और अलग खेल हो रहे। जगह जगह पर अटके श्रमिक भाईयोंको अपने घरों को जाने की अदम्य इच्छा को गृह मन्त्रालय ने रेल प्रशासन को साथ लेकर मूर्त स्वरूप दिया।
जो स्टेशन कई दिनोंसे खुले नही थे, रेलवे संक्रमण के चलते, अपने कई कर्मचारियोंको घर बैठे तनख्वाह दे रही थी, ऐसी स्थिति में, इन श्रमिकोंको घर पहुंचाने के लिए रेलवे का पूरा महक़मा काम पे लग गया, रेलवे के अफसर राज्य सरकारोंसे सम्पर्क कर रहे है, तो सुरक्षा कर्मी अपनी जान जोख़िम में डाल इन लोगोंकी सुरक्षा के लिए तैनात है, गाड़ियोंमे भी इनके साथ जा रहे। खाने के लिए व्यवस्थाएं की जा रही है। पानी की बोतलें दी जा रही है।
लेकिन निम्नलिखित व्हिडियो में देखिए, क्या यही अनुशासन है? क्या इस तरह का व्यवहार शोभा देता है? एक तरफ इन श्रमिकोंसे किराया न लेने पर अलग अलग चर्चाएं हो रही है और दुसरी तरफ मुफ्त में परोसा गया खाना, पानी की बोतलें यह लोग प्लेटफार्म पर फेंक रहे है। रेल्वेके स्टाफ़ को गालियां देते है। बताइए लॉक डाउन हटने के बाद भी क्या रेलवे सुचारू रूप से चलाई जा सकेगी?
कोई कार्य सेवा भाव से किया जाता है, पर उसका सिला इस तरह मिलेगा तो मन खट्टा हो जाता है। यह ठीक उसी तरह की प्रताड़ना है, जिस तरह करोंना वॉरियर्स, डॉक्टरों को पीटा जा रहा है। यहाँ गालियाँ है, खाना, पानी फेंकना है।
हम मानते है, यह हमारा क्षेत्र नही और ना ही विषय है, लेकिन माहौल ऐसा ही चल रहा है की जरूरी है उपचार कराने की जरूरत पडने से पहले ही हम उपाय कर ले।
यह व्हिडियो एक प्रशिक्षित द्वारा, आर्ट ऑफ लिविंग इंटरनेशनल सेंटर, बेंगलुरु ने बनाया गया है। वीडियो आसान सी अंग्रेजी में है और शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाई जा सके इस लिए व्यायाम बताए गए है।
आप भी किसी तज्ञ की सलाह / जानकारी लेकर इन छोटे छोटे व्यायाम कर के लाभ ले।
तो क्या वे टिकट अनमोल है? जी हाँ! उन श्रमिकोंके लिए तो बिल्कुल अनमोल है, जो अपने घरोंको जाने के लिए बैचेन थे।
रही बात टिकटोंके दाम की तो कुल किराएका 85% मूल्य रेल प्रशासन चुका रहा है और 15% राज्य सरकार। अब आप सोच रहे होंगे जब 85% रेलवे चुका रही है तो राज्य सरकारोंसे 15% भी क्यों वसूल रही है, मुफ्त में ही ले जा लेती श्रमिक भाइयोंको?
इसकी वजह यह है, जब हजारों श्रमिक अपने अपने गांव जाने के लिए बेचैन है और एक बार मे सीट्स रहेंगे 1000-1200 तो उनका उत्तरदायित्व लेकर, सही जरूरतमंद व्यक्ति ही गाड़ी में पहुंचे और नियंत्रित स्वरूप में पहुंचे। दूसरा यह की हर व्यक्ति जो यात्रा करेगा वह दोनों सिरेपर याने जहाँसे गाड़ीमे चढ़ेगा और जहाँतक जाना है उस स्टेशन पर उतरेगा, उसके स्वास्थ्य की जिम्मेदारी राज्य शासन को उठानी थी। जब अकाउंटिंग किया जाता है तो हर उस काम एक लयबद्धता और अनुशासन आ जाता है।
गाड़ियाँ कहीं भी रुकनेवाली नही थी, याने यात्रिओंके लिए कोई कमर्शियल स्टॉपेज नही था। चूँकि गाडीभी स्पेशल ही थी। गाड़ीमे रेल प्रशासन की ओरसे यात्रिओंको खाना, पीने के लिए पानी की व्यवस्था उनके जगहोंपर की गई थी ताकी सोशल डिस्टेनसिंग सलामत रहे, मेंटेन रहे।
इसके आगे तो गाड़ियोंमे यात्रा करने वाले श्रमिक बन्धु ही बोल सकते है, की उनका सफर किस तरह सुगमता से हुवा होगा।
जयपुर पटना स्पेशल, एर्नाकुलम दानापुर स्पेशल, तिरुर दानापुर स्पेशल, बेंगालुरु दानापुर स्पेशल 2 गाड़ी, कोटा बरौनी स्पेशल, कोटा गया स्पेशल
उपरोक्त गाड़ियाँ केवल और केवल राज्य शासन की विनती अनुसार चलाई जा रही है। राज्य शासन ही इस गाड़ी के यात्री बुक कर रहे है और यात्रिओंको गाड़ियोंमे बिठाकर रवाना कर रहे है। यह गाड़ियाँ पॉइन्ट टू पॉइंट याने स्टार्टिंग स्टेशन से सीधे गन्तव्य तक चलेगी। इसमें बीच के किसी भी यात्री को चढ़ने उतरने की अनुमति नही है और ना ही किसी यात्री को